
इकरा हसन
New Delhi: संसद के भीतर महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक पर हुई चर्चा उस वक्त गर्मा गई जब कैराना से समाजवादी पार्टी की सांसद इकरा हसन ने सरकार की मंशा पर सीधा सवाल खड़ा कर दिया। बहस के दौरान उन्होंने साफ कहा कि महिला आरक्षण कानून को जिस तरह से लागू करने में देरी की जा रही है, वह सिर्फ राजनीतिक फायदे के लिए किया जा रहा कदम है और इससे महिलाओं के अधिकारों के साथ “धोखा” हो रहा है। उनके बयान के बाद सदन का माहौल कुछ देर के लिए काफी तीखा हो गया।
इकरा हसन ने सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि 2023 में पास हो चुके महिला आरक्षण विधेयक को अब तक लागू न करना अपने आप में सवाल खड़े करता है। उन्होंने कहा कि सरकार जनगणना और परिसीमन की आड़ लेकर इस महत्वपूर्ण कानून को लटकाए हुए है, ताकि 2029 के चुनावों में इसका राजनीतिक फायदा उठाया जा सके। उनके मुताबिक पहले यह कहा गया था कि बिना नई जनगणना के आरक्षण लागू नहीं हो सकता, लेकिन अब पुराने आंकड़ों के आधार पर इसे लागू करने की चर्चा हो रही है, जो सरकार की नीयत पर सवाल उठाता है।
सांसद ने सरकार की पूरी रणनीति को “पॉलिटिकल अपॉर्चुनिज्म” बताया और कहा कि 2011 की जनगणना के आधार पर 2029 का प्रतिनिधित्व तय करना पूरी तरह गलत है। उनके अनुसार जब तक यह प्रक्रिया पूरी होगी, तब तक ये आंकड़े 18 साल पुराने हो चुके होंगे, जिससे लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की वास्तविकता प्रभावित होगी।
उन्होंने संविधान के आर्टिकल 81, 82 और 170 का हवाला देते हुए कहा कि प्रतिनिधित्व हमेशा जनसंख्या के अनुपात में होना चाहिए, ताकि “एक व्यक्ति, एक वोट” का सिद्धांत पूरी तरह लागू हो सके। इकरा हसन ने यह भी सवाल उठाया कि परिसीमन आयोग को जो शक्तियां दी जा रही हैं, उन पर न्यायिक समीक्षा का अभाव लोकतंत्र के लिए खतरे जैसा है। उन्होंने कहा कि अगर आयोग के फैसलों को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती, तो यह लोकतंत्र के “चेक एंड बैलेंस” सिस्टम को कमजोर करता है।
अपने संबोधन में इकरा हसन ने यह भी कहा कि महिलाओं को एक समान समूह मान लेना गलत है। उन्होंने तर्क दिया कि समाज में महिलाओं की वास्तविक स्थिति उनकी जाति, वर्ग और सामाजिक पृष्ठभूमि पर निर्भर करती है। उनके अनुसार ग्रामीण या पिछड़े वर्ग की महिलाएं, जो पहली बार राजनीति में कदम रखने का सपना देखती हैं, वे बिना विशेष आरक्षण के मुख्यधारा में जगह नहीं बना पाएंगी।
उन्होंने दिवंगत समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव का जिक्र करते हुए कहा कि सामाजिक न्याय और ओबीसी प्रतिनिधित्व के बिना महिला आरक्षण केवल एक सीमित वर्ग तक ही फायदा पहुंचाएगा। उनके अनुसार अगर आरक्षण व्यवस्था में सामाजिक विविधता को शामिल नहीं किया गया, तो यह कानून असमानता को और बढ़ा सकता है।
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इकरा हसन ने अपने संबोधन में महिला आरक्षण को लेकर कुछ अहम मांगें भी रखीं। उन्होंने कहा कि इस कानून को जनगणना और परिसीमन से अलग करके तुरंत लागू किया जाना चाहिए ताकि महिलाओं को उनका हक समय पर मिल सके। साथ ही उन्होंने सुझाव दिया कि यदि सरकार जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व की बात करती है, तो महिलाओं को 33 प्रतिशत की बजाय उनकी वास्तविक हिस्सेदारी के अनुसार लगभग 48 से 49 प्रतिशत आरक्षण मिलना चाहिए। उन्होंने यह भी मांग की कि ओबीसी और अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं के लिए अलग से कोटा तय किया जाए, ताकि समाज के हर तबके की महिलाओं को समान अवसर मिल सके।
Location : New Delhi
Published : 17 April 2026, 1:39 PM IST