बिहार NDA में वर्चस्व की जंग: चिराग पासवान और जीतन राम मांझी में आर-पार, ‘दलित’ वोट बैंक के नेता बनने की मची होड़

बिहार एनडीए के दो बड़े चेहरों चिराग पासवान और जीतन राम मांझी के बीच दलित वोट बैंक के नेतृत्व को लेकर सियासी टकराव तेज हो गया है। मांझी के एक विवादित बयान पर चिराग की सार्वजनिक आपत्ति के बाद दोनों नेताओं के बीच जुबानी जंग तेज है।

Post Published By: Tanya Chand
Updated : 21 May 2026, 9:29 AM IST
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Patna: बिहार एनडीए (NDA) के दो दिग्गज दलित नेता केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी और लोजपा (रामविलास) प्रमुख चिराग पासवान एक बार फिर आमने-सामने हैं। दोनों नेताओं के बीच जारी यह तल्खी उस वक्त खुलकर सामने आ गई जब दिल्ली में एक युवक की मौत पर जीतन राम मांझी ने विवादित टिप्पणी करते हुए कहा, "मर गया तो मर गया।"

मांझी के इस असंवेदनशील बयान पर कड़ी आपत्ति जताते हुए चिराग पासवान ने सार्वजनिक रूप से उनकी आलोचना की। चिराग ने साफ लहजे में कहा कि सार्वजनिक जीवन में इस तरह की भाषा और रवैया बिल्कुल भी उचित नहीं है। यह पहला मौका नहीं है जब चिराग ने मांझी के बयानों का खुलकर विरोध किया हो, इससे पहले भी दोनों नेताओं के बीच कई बार तीखी जुबानी जंग देखने को मिल चुकी है।

16 फीसदी दलित-महादलित वोट बैंक की लड़ाई

राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि चिराग पासवान और जीतन राम मांझी के बीच की यह तल्खी महज एक बयानबाजी नहीं है, बल्कि इसके पीछे बिहार का करीब 16 फीसदी दलित और महादलित वोट बैंक है। दोनों ही नेता खुद को इस बड़े और निर्णायक वर्ग का असली मसीहा साबित करने की होड़ में हैं।

आंकड़ों के लिहाज से देखें तो बिहार में पासवान समुदाय की आबादी करीब 6 फीसदी है। दिवंगत नेता रामविलास पासवान के निधन और पार्टी में टूट के बावजूद पासवान समाज का एकतरफा समर्थन चिराग पासवान के साथ माना जाता है। वहीं दूसरी ओर, सूबे में करीब 6 फीसदी आबादी मुसहर समुदाय की है, जो जीतन राम मांझी का कोर और सबसे मजबूत वोट बैंक है।

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एक दर्जन सीटों पर निर्णायक भूमिका, सीट शेयरिंग में दिखा दम

बिहार की राजनीति में दलित और महादलित मतदाता एक दर्जन से अधिक लोकसभा सीटों और दर्जनों विधानसभा सीटों पर हार-जीत तय करते हैं। जीतन राम मांझी अक्सर यह दावा करते रहे हैं कि बिहार की कम से कम 40 सीटों पर उनकी मजबूत पकड़ है और वे परिणाम बदलने का माद्दा रखते हैं।

हालांकि, हालिया सियासी घटनाक्रमों और आगामी बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर एनडीए में हुए सीट बंटवारे की कशमकश में चिराग पासवान का पलड़ा भारी दिखाई दिया है। गठबंधन के भीतर सीट शेयरिंग के दौरान चिराग पासवान, मांझी की तुलना में कहीं अधिक प्रभावशाली और मजबूत स्थिति में नजर आए हैं, जिससे दोनों के बीच की सियासी प्रतिद्वंद्विता और गहरी हो गई है।

2024 के बाद तेजी से बदला चिराग का सियासी ग्राफ

अगर इतिहास पर नजर डालें तो 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में चिराग पासवान एनडीए का हिस्सा नहीं थे और अकेले चुनाव लड़ते हुए उनकी पार्टी को सिर्फ एक सीट मिली थी। लेकिन उनकी रणनीति ने नीतीश कुमार की पार्टी (जदयू) को भारी नुकसान पहुंचाया था। इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में एनडीए के साथ मजबूत वापसी करते हुए चिराग पासवान ने अभूतपूर्व सफलता हासिल की।

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उन्होंने जिन 5 सीटों पर चुनाव लड़ा, उन सभी पर जीत दर्ज कर 100 फीसदी का स्ट्राइक रेट हासिल किया। वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक बिहार में कुल दलित आबादी लगभग 19 फीसदी है, जिसमें से औसतन 6 फीसदी से ज्यादा का सॉलिड वोट बैंक हमेशा चिराग के साथ खड़ा दिखता है। यही मजबूत राजनैतिक कद मौजूदा समय में एनडीए के भीतर मांझी और चिराग के बीच वर्चस्व की मुख्य वजह बना हुआ है।

Location :  Patna

Published :  21 May 2026, 9:29 AM IST

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