The Candid Talk: आचार्य डॉ. लोकेश मुनि ने सोशल मीडिया और समाज पर रखी बेबाक राय, बोले- लाइक्स और फॉलोअर्स से तय नहीं होता जीवन

डाइनामाइट न्यूज़ के खास पॉडकास्ट The Candid Talk में आध्यात्मिक गुरु आचार्य डॉ. लोकेश मुनि ने धर्म, अहिंसा, सोशल मीडिया, राजनीति, मानसिक तनाव और युवाओं के भविष्य जैसे मुद्दों पर खुलकर बातचीत की। उन्होंने कहा कि दुनिया को बदलने से पहले इंसान को खुद को बदलना होगा।

Post Published By: Nidhi Kushwaha
Updated : 17 May 2026, 8:41 AM IST

New Delhi: डाइनामाइट न्यूज़ के एडिटर-इन-चीफ मनोज टिबड़ेवाल आकाश ने आज का The Candid Talk पॉडकास्ट में आध्यात्मिक गुरु और विश्व शांति से जोड़ने का कार्य करने वाले अहिंसा विश्व भारती के संस्थापक आचार्य डॉ. लोकेश मुनि से खास बातचीत की। आचार्य डॉ. लोकेश ने बातचीत में  बेबाक सवालों का सीधा जवाब दिया। डाइनामाइट न्यूज़ के दिल्ली स्टूडियो में आध्यात्मिक गुरु आचार्य डॉ. लोकेश मुनि ने समाज सुधार, नैतिकता और विश्व शांति पर बेबाक बातचीत की।

आचार्य, अहिंसा विश्व भारती के संस्थापक,संस्था का उद्देश्य और कार्य क्या है?

आध्यात्मिक गुरु आचार्य डॉ. लोकेश मुनि ने बताया, "अहिंसा विश्व भारती संस्था की स्थापना वर्ष 2005-06 में की थी। इसका उद्देश्य था कि धर्म को अध्यात्म से जोड़ा जाए, धर्म को समाज सेवा से जोड़ा जाए और धर्म को सामाजिक कुरीतियों के निवारण का माध्यम बनाया जाए। अगर ऐसा होता है तो धर्म का तेजस्वी स्वरूप दुनिया के सामने आ सकता है। इसी के साथ अहिंसा विश्व भारती ने भारत के पहले “विश्व शांति केंद्र” की स्थापना भी की है। हमारा उद्देश्य पूरी दुनिया में अहिंसा, शांति और सद्भावना का संदेश फैलाना है। जिससे दुनिया हिंसा, युद्ध, तनाव, गरीबी और अभाव से मुक्त हो सके।"

जैन साधु सफेद वस्त्र क्यों पहनते हैं और मुख पर पट्टी क्यों लगाते हैं?

डॉ. लोकेश मुनि ने बताया, "जैन धर्म की दो प्रमुख शाखाएं हैं- दिगंबर और श्वेतांबर। दिगंबर परंपरा में साधु वस्त्र धारण नहीं करते, जबकि श्वेतांबर परंपरा में साधु सफेद वस्त्र पहनते हैं। श्वेतांबर परंपरा की भी तीन शाखाएं हैं- मूर्तिपूजक, स्थानकवासी और तेरापंथ। मुख पर पट्टी लगाने का उद्देश्य सूक्ष्म जीवों की रक्षा करना है, जिससे सांस लेते समय भी किसी जीव को हानि न पहुंचे। यह अहिंसा के प्रति अत्यंत संवेदनशील दृष्टिकोण को दर्शाता है। मैं तेरापंथ परंपरा से जुड़ा हूं। मेरे दीक्षा गुरु आचार्य तुलसी थे, जिन्होंने “अनुव्रत आंदोलन” का प्रवर्तन किया और एक लाख किलोमीटर से अधिक पदयात्राएं की। मेरे शिक्षा गुरु आचार्य महाप्रज्ञ थे। इन महान संतों के सान्निध्य में मुझे अध्यात्म सीखने का अवसर मिला।"

अहिंसा का वास्तविक अर्थ क्या है? क्या सिर्फ हिंसा न करना ही अहिंसा है?

डॉ. लोकेश मुनि ने बताया, अहिंसा का अर्थ केवल किसी को न मारना नहीं है। इसका गहरा अर्थ है- दूसरों के अस्तित्व को स्वीकार करना, उनके विचारों का सम्मान करना और सभी धर्मों के प्रति आदर रखना। जैन धर्म में तो यहां तक कहा गया है कि किसी को मानसिक ठेस पहुंचाना भी हिंसा है। अहिंसा का सकारात्मक स्वरूप करुणा, प्रेम, दया, अनुकंपा और संवेदनशीलता है। हम अपने धर्म का सम्मान करें और साथ में दूसरे धर्म के लोगों को भी ठेस नहीं पहुंचानी चाहिए।"

The Candid Talk: कैंसर को लेकर बड़ा मिथक टूटा, विशेषज्ञ ने समझाया बायोप्सी, इलाज और पहचान का सही समय

समाज में हिंसा और अपराध लगातार बढ़ रहे हैं। इसका समाधान क्या है?

उन्होंने आगे कहा, "हिंसा कभी किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकती। हिंसा केवल प्रतिहिंसा को जन्म देती है। हर समस्या का समाधान संवाद और वार्ता से निकाला जा सकता है। दुनिया में ऐसी कोई समस्या नहीं है, जिसका हल बातचीत और समझदारी से न निकाला जा सके। हमें यह प्रयास करना चाहिए कि अहिंसा का दीपक कभी बुझने न पाए। युद्ध, हिंसा और आतंक किसी समस्या का समाधान नहीं है।"

डॉ. लोकेश मुनि ने क्यों चुनी अध्यात्म की राह?

डॉ. लोकेश मुनि ने बताया, "जब मैं 12-13 वर्ष का था, तब हमारे गांव में एक संत आए थे। उनका व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली था कि मेरे मन में विचार आया कि मुझे भी उनके जैसा बनना है। बाद में जैसे-जैसे समझ और शिक्षा बढ़ी, मेरा संकल्प भी मजबूत होता गया। हालांकि मेरे माता-पिता ने शुरुआत में अनुमति नहीं दी, लेकिन करीब 10 साल बाद मुझे उनकी सहमति मिली।"

जैन धर्म के मूल संदेश को युवा पीढ़ी तक पहुंचाने का सबसे सरल माध्यम क्या?

आध्यात्मिक गुरु ने बताया, "केवल जैन धर्म ही नहीं बल्कि किसी भी धर्म और अध्यात्म को लेकर अक्सर कहा जाता है कि युवा पीढ़ी उससे दूर हो रही है। लेकिन मेरा अनुभव इससे अलग है। मेरा मानना है कि यदि धर्म हमारी आदतों को बदलने वाला हो, हमारे स्वभाव को परिष्कृत करने वाला हो और हमारी चेतना को जागृत करने वाला हो तो युवा आज भी उससे जुड़ना चाहते हैं। असल में जीवन में बदलाव केवल उपदेशों या सिद्धांतों से नहीं आता, बल्कि प्रयोगों से आता है। जहां धर्म का प्रयोगात्मक स्वरूप दिखाई देता है, वहां युवा स्वतः आकर्षित होते हैं। उदाहरण के तौर पर हम एंगर मैनेजमेंट, स्ट्रेस मैनेजमेंट और मेडिटेशन के प्रयोग कराते हैं। जिन लोगों को गुस्से की समस्या होती है, वे इन शिविरों में आकर अपने व्यवहार में बदलाव महसूस करते हैं। नशे की आदत वाले लोगों को भी इन प्रयोगों से लाभ मिलता है।"

यदि कोई व्यक्ति डॉ. लोकेश मुनि के शिविरों में शामिल होना चाहे तो उसे क्या करना होगा?

डॉ. लोकेश मुनि ने इसको लेकर बताया, "उसे केवल समर्पण भाव के साथ आना होगा। इसी उद्देश्य से हमने दिल्ली-एनसीआर के गुरुग्राम में “विश्व शांति केंद्र” की स्थापना की है, जो दिल्ली एयरपोर्ट से मात्र 20 मिनट की दूरी पर है। वहां नियमित रूप से मेडिटेशन, योग, एंगर मैनेजमेंट, स्ट्रेस मैनेजमेंट और सेल्फ मैनेजमेंट जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। भविष्य में आवश्यकता हुई तो हम ऑनलाइन माध्यम से भी ऐसे कोर्स शुरू कर सकते हैं।"

धर्म के नाम पर राजनीति और समाज में विभाजन को कैसे रोके?

डॉ. लोकेश मुनि ने इस पर कहा, "राजनीति कभी सेवा का माध्यम हुआ करती थी, लेकिन जब "नीति" खत्म हो जाती है तो केवल “राज” बचता है। प्राचीन समय में राजा-महाराजा संतों के पास मार्गदर्शन लेने जाया करते थे। राजनीति को धर्म से प्रेरणा लेनी चाहिए, लेकिन धर्म में राजनीति का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। धर्म के क्षेत्र में हिंसा, घृणा और नफरत का कोई स्थान नहीं हो सकता। यदि राजनीतिक और धार्मिक नेतृत्व “पहले देश, फिर दल और अंत में स्वयं” की भावना से काम करें, तो देश को नई दिशा मिल सकती है।"

जिंदगी में मानसिक शांति खोती जा रही है। इसका समाधान क्या है?

उन्होंने इस सवाल का जवाब देते हुए कहा, "मन की शांति ही विश्व शांति का आधार है। समस्या यह है कि हम शांति चाहते हैं, लेकिन चलते उस रास्ते पर हैं जो अशांति की ओर ले जाता है। दुनिया के बड़े-बड़े राष्ट्र शांति की बात करते हैं, लेकिन हथियारों पर अरबों डॉलर खर्च करते हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि शांति और अहिंसा का भी प्रशिक्षण दिया जाए। इसी सोच के साथ हमने भारत का पहला “विश्व शांति केंद्र” स्थापित किया है, जिससे जहां भी संघर्ष और तनाव हो, वहां संवाद और शांति के माध्यम से समाधान खोजा जा सके।"

टेक्नोलॉजी के दौर में लोग पूरी दुनिया से जुड़े होने के बावजूद अकेलेपन का शिकार क्यों?

डॉ. लोकेश मुनि ने इस पर कहा, "हर चीज की तरह तकनीक के भी दो पहलू हैं। सीमित उपयोग तक वह वरदान है, लेकिन अति होने पर वही अभिशाप बन जाती है। आज लोग तकनीक के इतने आदी हो गए हैं कि उसका असर उनकी दिनचर्या और मानसिक स्थिति पर पड़ने लगा है। मुझे लगता है कि आने वाले समय में जैसे लोग उपवास करते हैं, वैसे ही “डिजिटल उपवास” की भी आवश्यकता पड़ेगी।"

आज के युवाओं की सबसे बड़ी समस्या क्या है?

डॉ. लोकेश मुनि ने इस पर कहा, "सफलता पाने की इच्छा बुरी नहीं है। बड़े सपने देखना भी गलत नहीं है। लेकिन व्यक्ति को अपनी आंतरिक शक्तियों को पहचानना चाहिए। मनुष्य केवल शरीर नहीं है, उसके भीतर अपार ऊर्जा और क्षमता छिपी हुई है। जब व्यक्ति अपनी आंतरिक शक्ति को जागृत करता है, तब सफलता उसके कदम चूमती है।"

कर्म और भाग्य में कौन बड़ा है?

कर्म और भाग्य दोनों सत्य हैं। भगवान महावीर ने कर्म, पुरुषार्थ और नियति- तीनों को स्वीकार किया है। मैं हमेशा कहता हूं कि भाग्य हाथ की रेखाओं में नहीं, बल्कि हमारे पुरुषार्थ में छिपा होता है। जब हमारी आत्मा अच्छे कार्यों में लगती है, तो सद्भाग्य बनता है और बुरे कार्यों में लगती है तो दुर्भाग्य बनता है। इसलिए इंसान स्वयं अपने भाग्य का निर्माता है।

सोशल मीडिया पर जो कुछ दिखता है वह बहुत चमकदार होता है। ऐसे में असली और नकली जीवन के बीच फर्क कैसे पहचाना जाए?

डॉ. लोकेश मुनि ने आगे बताया, "सोशल मीडिया पर जो दिखाई देता है वह अक्सर चमकदार होता है। लेकिन उस चमक के पीछे कितना पुरुषार्थ, संघर्ष और परिश्रम लगा है, यह लोग नहीं देखना चाहते। केवल सपने देखने से कुछ नहीं होता। ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने कहा था कि सपने वे नहीं होते जो सोते समय देखे जाएं, बल्कि सपने वे होते हैं जो हमें सोने न दें। इसलिए यदि पुरुषार्थ और पराक्रम किया जाए, तो सोशल मीडिया पर दिखने वाली सफलता को वास्तविक जीवन में भी हासिल किया जा सकता है।"

क्या आज के दौर में लाइक्स और फॉलोअर्स ही लोगों की आत्म-मूल्य तय कर रहे हैं?

जो लोग इससे प्रभावित होते हैं, उन्हें समझना चाहिए कि सोशल मीडिया की दुनिया और वास्तविक जीवन अलग-अलग हैं। कई ऐसे लोग भी हैं जो सोशल मीडिया पर लगातार ट्रेंड करते हैं, लेकिन उनका वास्तविक जीवन संघर्षों और विवादों से भरा हुआ है। जैन दर्शन में दो शब्द आते हैं - “उपादान” और “निमित्त”। हमारे जीवन का मूल आधार हमारा पुरुषार्थ, साधना और कर्म होना चाहिए। लाइक्स और फॉलोअर्स बढ़ते-घटते रहते हैं, उनसे जीवन का वास्तविक मूल्य तय नहीं होता।

युवाओं में एंजायटी और अकेलेपन का संकट गहराया, आत्मिक शांति के लिए अध्यात्म जरूरी: डॉ चिन्मय पांड्या

सोशल मीडिया लोगों के गुस्से और नफरत की वजह क्या है?

आज सोशल मीडिया के माध्यम से सबसे ज्यादा नफरत और विभाजन फैलाने वाली बातें परोसी जा रही हैं। मैं अक्सर कहता हूं कि पर्यावरण प्रदूषण जितना खतरनाक है, उससे भी ज्यादा खतरनाक वैचारिक प्रदूषण है। सड़कों का कचरा तो साफ किया जा सकता है, लेकिन जो नफरत का कचरा हम आने वाली पीढ़ियों के मन में भर रहे हैं, उसे साफ करने में पीढ़ियां लग जाएंगी।

सोशल मीडिया पर हर समय जुड़े रहते हैं, फिर भी भावनात्मक जुड़ाव कम क्यों हो रहा है?

क्योंकि हम इंसानों से कम और मशीनों से ज्यादा जुड़ रहे हैं। भावनाएं इंसानों से जुड़ने से पैदा होती हैं, मशीनों से नहीं। पश्चिमी देशों में यही सबसे बड़ी समस्या बनती जा रही है। वहां भौतिक सुविधाएं तो हैं, लेकिन मानसिक शांति और भावनात्मक संतुलन की कमी बढ़ती जा रही है। इसलिए जीवन में संतुलन बहुत आवश्यक है।

क्या आधुनिक लाइफस्टाइल हमें हमारे संस्कारों से दूर कर रही है?

उन्होंने कहा, "भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी ताकत उसका पारिवारिक और सामाजिक ढांचा रहा है। मैंने दुनिया के कई देशों की यात्रा की है, लेकिन भारतीय संस्कृति जैसी आत्मीयता कहीं नहीं देखी। आज संयुक्त परिवार की परंपरा कमजोर हो रही है। यही कारण है कि वृद्धाश्रम बढ़ रहे हैं और समाज में भावनात्मक दूरियां पैदा हो रही हैं। यदि भारत को मजबूत बनाना है तो भ्रष्टाचार, जनसंख्या विस्फोट और प्रदूषण जैसी समस्याओं पर नियंत्रण जरूरी है।"

डॉ. लोकेश मुनि ने कन्या भ्रूण हत्या, नशाखोरी और पर्यावरण जैसे मुद्दों पर काम किया है। डॉ. लोकेश मुनि ने इस पर कहा, "बदलाव धीरे-धीरे आता है। विचार क्रांति समय के साथ आचरण क्रांति में बदलती है। कन्या भ्रूण हत्या, नशाखोरी और पर्यावरण प्रदूषण जैसी समस्याओं के खिलाफ लगातार जागरूकता जरूरी है। मैंने गुजरात से अमृतसर तक “सर्वधर्म सद्भाव पदयात्रा” निकाली थी। उसका उद्देश्य कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ जागरूकता फैलाना था। आज बदलाव दिख भी रहा है, लेकिन निरंतर प्रयास जरूरी हैं।"

दुनिया के नेताओं को केवल एक संदेश देना हो, तो वह क्या होगा?

डॉ. लोकेश मुनि ने इस पर कहा, "कथनी और करनी में समानता होनी चाहिए। दुनिया की सबसे बड़ी समस्या यही है कि लोग कहते कुछ हैं और करते कुछ और हैं। यदि ईमानदारी और आचरण में एकरूपता आ जाए, तो यह धरती स्वर्ग बन सकती है। अंत में आचार्य डॉ. लोकेश मुनि ने दर्शकों को संदेश देते हुए कहा कि यदि इंसान दुनिया बदलने से पहले स्वयं को बदलने और समझने का प्रयास करे तो समाज और मानवता दोनों का भविष्य बेहतर हो सकता है।"

Location :  New Delhi

Published :  17 May 2026, 8:34 AM IST