WhatsApp को Supreme Court ने दी देश छोड़ने की चेतावनी, कहा- हमारी बात मानो नहीं तो चले जाओ; जानें पूरा मामला

WhatsApp की प्राइवेसी पॉलिसी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने Meta Platforms को कड़ी चेतावनी दी है। कोर्ट ने साफ कहा है कि नागरिकों की निजता से समझौता नहीं होगा और 9 फरवरी को अंतरिम आदेश आएगा।

Post Published By: Mayank Tawer
Updated : 3 February 2026, 2:34 PM IST
google-preferred

New Delhi: मोबाइल स्क्रीन पर दिखने वाले हर मैसेज, हर विज्ञापन और हर नोटिफिकेशन के पीछे अगर आपकी निजी जिंदगी झांक रही हो तो खतरा साफ है। इसी खतरे को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को WhatsApp और उसकी पैरेंट कंपनी Meta Platforms को कड़ी चेतावनी दी। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि भारत में रहकर कोई भी टेक कंपनी नागरिकों की निजता के अधिकार के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकती। यहां तक कह दिया गया कि अगर कंपनियां भारतीय संविधान का पालन नहीं कर सकती तो उन्हें देश छोड़ देना चाहिए।

प्राइवेसी पॉलिसी पर Supreme Court की सुनवाई

यह टिप्पणी मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने उस याचिका की सुनवाई के दौरान की। जिसमें Meta और WhatsApp ने राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण यानी NCLAT के आदेश को चुनौती दी है। NCLAT ने भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग द्वारा 2021 की WhatsApp प्राइवेसी पॉलिसी पर लगाए गए 213.14 करोड़ रुपये के जुर्माने को बरकरार रखा था।

CCI बनाम Meta की जंग

मामले में दिलचस्प मोड़ तब आया, जब CCI ने भी अलग से सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। CCI ने NCLAT के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें WhatsApp को विज्ञापन के लिए यूजर डेटा साझा करने की छूट दी गई थी। अदालत ने माना कि यह मामला सिर्फ जुर्माने का नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की निजता से जुड़ा हुआ है।

9 फरवरी को आएगा अंतरिम आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को भी पक्षकार बनाने का आदेश दिया है। कोर्ट ने Meta और WhatsApp से साफ कहा कि वे लिखित में आश्वासन दें कि यूजर डेटा साझा नहीं किया जाएगा, वरना अदालत को सख्त आदेश देना पड़ेगा। बेंच ने स्पष्ट किया कि इस मामले में 9 फरवरी को अंतरिम आदेश पारित किया जाएगा।

कोर्ट के तीखे सवाल

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने WhatsApp के बाजार में दबदबे पर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि जब विकल्प ही सीमित हों, तो यूजर की सहमति कितनी स्वतंत्र मानी जा सकती है। कोर्ट ने पूछा कि क्या आम आदमी कंपनी की जटिल प्राइवेसी पॉलिसी को सच में समझ पाता है। अदालत ने साफ किया कि सहमति तभी वैध होगी, जब वह स्पष्ट और सरल भाषा में दी गई हो।

‘डेटा चोरी का सभ्य तरीका’

चीफ जस्टिस ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि WhatsApp की प्राइवेसी शर्तें इतनी चालाकी से तैयार की गई हैं कि आम यूजर उन्हें समझ ही नहीं पाता। उन्होंने कहा कि डेटा शेयरिंग के नाम पर निजी जानकारी की चोरी किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उन्होंने यहां तक कहा कि अगर कंपनियां संविधान का सम्मान नहीं कर सकतीं, तो भारत में कारोबार करने का उन्हें कोई अधिकार नहीं है।

Meta की दलील

Meta और WhatsApp की ओर से वरिष्ठ वकीलों ने दलील दी कि मैसेज एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड हैं और कंपनी उन्हें पढ़ नहीं सकती। साथ ही बताया गया कि जुर्माने की राशि जमा कर दी गई है। Meta ने डेटा उपयोग को लेकर हलफनामा दाखिल करने पर सहमति जताई है, जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया।

Location : 
  • New Delhi

Published : 
  • 3 February 2026, 2:34 PM IST

Related News

No related posts found.

Advertisement
Advertisement