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सुप्रीम कोर्ट में नकद चंदे पर सवाल (Img: Pinterest)
New Delhi: राजनीतिक दलों को मिलने वाले नकद चंदे को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक अहम मामला सामने आया है। सुनवाई के दौरान आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 13A के एक प्रावधान की वैधता पर सवाल उठाए गए हैं। याचिका में विशेष रूप से Section 13A(d) को असंवैधानिक बताते हुए चुनौती दी गई है।
मामले में दलील दी गई है कि राजनीतिक दलों को मिलने वाले छोटे नकद चंदों को गुमनाम रखने की व्यवस्था राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता को प्रभावित कर सकती है। याचिकाकर्ता ने राजनीतिक दलों के नकद चंदे पर पूरी तरह रोक लगाने और चंदा देने वालों की जानकारी सार्वजनिक करने की मांग की है।
याचिका में आयकर अधिनियम की धारा 13A के उस प्रावधान पर सवाल उठाया गया है, जिसके तहत राजनीतिक दलों को निर्धारित सीमा से कम राशि के नकद चंदे के संबंध में दानदाता की पहचान का रिकॉर्ड रखने से छूट मिलती है।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि इस तरह की व्यवस्था राजनीतिक दलों की फंडिंग को पूरी तरह पारदर्शी बनाने के उद्देश्य के विपरीत है। याचिका में कहा गया है कि मतदाताओं को यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि राजनीतिक दलों को आर्थिक सहयोग कौन कर रहा है और उसके पीछे क्या हित हो सकते हैं।
यह याचिका खेम सिंह भाटी की ओर से दायर की गई है। याचिका में कहा गया है कि राजनीतिक दलों की फंडिंग से जुड़ी जानकारी मतदाताओं के लिए महत्वपूर्ण है और इसका संबंध संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सूचना के अधिकार से जुड़ा है।
याचिकाकर्ता का कहना है कि यदि दानदाताओं की पहचान गुप्त रखी जाती है तो मतदाता राजनीतिक दलों के आर्थिक स्रोतों और संभावित प्रभावों के बारे में पूरी जानकारी प्राप्त नहीं कर सकते।
याचिका में राजनीतिक दलों को मिलने वाले नकद चंदे पर पूरी तरह रोक लगाने की मांग की गई है।
इसके साथ ही यह मांग भी की गई है कि राजनीतिक दलों के लिए प्रत्येक दानदाता का नाम, पता, पैन (PAN) विवरण
चंदे की राशि, अन्य आवश्यक वित्तीय जानकारी सार्वजनिक करना अनिवार्य किया जाए।
याचिका में तर्क दिया गया है कि राजनीतिक फंडिंग में अधिक पारदर्शिता से चुनावी प्रक्रिया की शुचिता और मतदाताओं के विश्वास को मजबूत किया जा सकता है।
मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ के समक्ष हो रही है। सुनवाई के दौरान राजनीतिक दलों को मिलने वाले नकद चंदे और उससे जुड़ी गोपनीयता की व्यवस्था पर कानूनी सवाल उठाए गए हैं। मामले में सुप्रीम कोर्ट का आगे का रुख राजनीतिक फंडिंग से जुड़े नियमों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
याचिका में वर्ष 2024 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए उस महत्वपूर्ण फैसले का भी हवाला दिया गया है, जिसमें इलेक्टोरल बॉन्ड योजना को असंवैधानिक करार दिया गया था।
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया है कि राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के मद्देनजर नकद चंदे से जुड़े प्रावधानों की भी समीक्षा की जानी चाहिए।
अब सुप्रीम कोर्ट के इस मामले में आने वाले निर्णय और आगे की सुनवाई पर राजनीतिक दलों की फंडिंग व्यवस्था तथा चुनावी पारदर्शिता से जुड़े सवालों के लिहाज से नजर बनी रहेगी।
Location : New Delhi
Published : 31 August 2026, 10:39 AM IST