सुप्रीम कोर्ट ने की टिप्पणी, दो से अधिक बच्चे पैदा करने पर दंड लगाने वाले कानून अप्रासंगिक

सुप्रीम कोर्ट ने घटते प्रजनन दर के चलते दो से अधिक बच्चे पैदा करने वाले कानून को अप्रासंगिक बताया है, क्योंकि पिछले कुछ दशकों में जनसांख्यिकीय परिवर्तनों के कारण अधिक जनसंख्या का डर खत्म हो गया है, जैसा कि प्रजनन दर में 3 से 1.9 की गिरावट से साफ नजर आ रही है।

Post Published By: Nitin Parashar
Updated : 4 November 2026, 3:22 PM IST
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New delhi: बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने घटते प्रजनन दर के चलते दो से अधिक बच्चे पैदा करने वाले कानून को अर्थहीन बताते हुए कहा है कि दो से अधिक बच्चे पैदा करने पर दंड लगाने वाले कानून अब प्रासंगिक नहीं रह गए हैं, क्योंकि पिछले कुछ दशकों में जनसांख्यिकीय परिवर्तनों के कारण अधिक जनसंख्या का डर खत्म हो गया है, जैसा कि प्रजनन दर में 3 से 1.9 की गिरावट से स्पष्ट है। ऐसे कानून संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रजनन स्वायत्तता का उल्लंघन करते हैं। जिसके चलते उन्होंने एक बड़ी पीठ को इस मुद्दे की जांच करने को कहा है।

Supreme court

सुप्रीम कोर्ट ने दो से अधिक बच्चे पैदा करने वाले कानून को बताया अप्रासंगिक (img-IANS)

भारत की कुल प्रजनन दर 3 से घटकर 1.9 हुई

न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और आलोक आराधे की पीठ ने कहा कि दो से अधिक बच्चे होने के आधार पर व्यक्तियों को चुनाव लड़ने से रोकने वाला कानून संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रजनन स्वायत्तता का उल्लंघन करता है। ऐसे कानूनों का आधार, यानी अधिक जनसंख्या का भय, पिछले कुछ दशकों में हुए जनसांख्यिकीय परिवर्तनों के कारण ध्वस्त हो गया है। हमने स्पष्ट किया है कि 2003 में जब जावेद बनाम हरियाणा राज्य मामले में ऐसे कानूनों को बरकरार रखा गया था, तब से भारत की कुल प्रजनन दर 3 से घटकर 1.9 हो गई है।

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अनुच्छेद 21 के तहत प्रजनन स्वायत्तता का उल्लंघन

गौरतलब है कि न्यायालय ने इस मुद्दे को एक बड़ी पीठ के पास इस प्रावधान की वैधता पर निर्णय लेने के लिए भेजा है। इस कारण हमें इस मामले की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी और इसे उच्च पीठ के समक्ष प्रस्तुत करना पड़ा। ऐसे कानून को लागू रहने देना नागरिकों के एक पूरे वर्ग को राजनीतिक प्रतिनिधित्व से वंचित करता है, जबकि उनका सार्वजनिक पद धारण करने की क्षमता से कोई खास संबंध या तर्कसंगत जुड़ाव नहीं है। इसके अलावा, यह बच्चों को जन्म देने और लोकतांत्रिक भागीदारी के बीच एक अनुचित विकल्प चुनने के लिए मजबूर करता है, जो अनुच्छेद 21 के तहत प्रजनन स्वतंत्रता का उल्लंघन है।

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आपको बता दें कि अदालत महाराष्ट्र की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव इंग द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उन्होंने तीसरे बच्चे को जन्म देने के कारण अपनी अयोग्यता को चुनौती दी थी। बॉम्बे हाई कोर्ट ने इससे पहले महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम के तहत इंगले की अयोग्यता को बरकरार रखा था। यह मामला महाराष्ट्र के काकोडा ग्राम पंचायत के सरपंच के रूप में इंगले के चुनाव से जुड़ा है।

Location :  New Delhi

Published :  4 November 2026, 3:22 PM IST

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