
अंग नगरी की गंगा से गायब हुई 'इलिस माछ' (IMG: Pinterest)
Bhagalpur: गंगा की लहरों के साथ तैरती चांदी जैसी चमक और पकने के बाद फैलने वाली खास खुशबू... हिलसा मछली यानी बंगाल की 'इलिस माछ' सिर्फ एक मछली नहीं, बल्कि पूर्वी भारत की खान-पान की परंपरा का अहम हिस्सा मानी जाती है। बिहार के भागलपुर और आसपास के अंग क्षेत्र का भी इस मछली से कभी गहरा रिश्ता बताया जाता है। पुराने मछुआरों और स्थानीय लोगों की यादों में वह दौर आज भी मौजूद है, जब मानसून के साथ गंगा में हिलसा की आवक शुरू होती थी।
लेकिन अब भागलपुर की गंगा में हिलसा का मिलना बेहद दुर्लभ हो गया है। स्थानीय मछली कारोबारियों के मुताबिक, खास मांग होने पर इसे बंगाल के मालदा, हावड़ा या कोलकाता की मंडियों से मंगाना पड़ता है। सीमित उपलब्धता, बर्फ में परिवहन और दूसरे खर्च जुड़ने के बाद इसकी कीमत करीब 3,000 रुपये प्रति किलो तक पहुंचने की बात स्थानीय कारोबारी बताते हैं।
स्थानीय बुजुर्गों और पुराने मछुआरों के अनुसार, 1960 और 1970 के दशक में भागलपुर के सुल्तानगंज से लेकर कहलगांव और बटेश्वर स्थान तक गंगा में हिलसा की अच्छी-खासी मौजूदगी थी। मानसून के दौरान समुद्र से नदी की ओर आने वाली इस मछली की गंगा में आवक बढ़ जाती थी। हिलसा एक प्रवासी मछली है। यह समुद्री या खारे पानी वाले क्षेत्र से मीठे पानी की नदियों में प्रजनन के लिए ऊपर की ओर जाती है। इसी वजह से नदियों का प्राकृतिक प्रवाह और मछलियों के आवागमन का रास्ता इसके जीवन चक्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
हिलसा के भागलपुर तक नहीं पहुंचने की कहानी में फरक्का बैराज का नाम सबसे ज्यादा लिया जाता है। फरक्का बैराज पश्चिम बंगाल में गंगा नदी पर बनाया गया एक महत्वपूर्ण जल ढांचा है। इसके निर्माण के बाद गंगा के प्रवाह, जल वितरण और नदी की पारिस्थितिकी को लेकर लंबे समय से चर्चा होती रही है। हिलसा समुद्र से नदियों की ओर प्रवास करती है। ऐसे में नदी के रास्ते में आने वाली भौतिक बाधाएं उसके प्रवासन को प्रभावित कर सकती हैं। फरक्का बैराज के कारण ऊपर की ओर मछलियों के आवागमन पर असर पड़ने की बात विशेषज्ञों और मत्स्य क्षेत्र से जुड़े लोगों द्वारा लंबे समय से कही जाती रही है।
प्रवासी मछलियों के लिए नदियों पर बने बैराज और बांध बड़ी चुनौती बन सकते हैं। इसी वजह से दुनिया के कई हिस्सों में Fish Pass या Fish Ladder जैसी संरचनाओं का इस्तेमाल किया जाता है, ताकि मछलियां नदी में बनी बाधा को पार कर सकें। हिलसा के मामले में भी मछलियों के प्राकृतिक आवागमन को बनाए रखने की जरूरत पर लंबे समय से चर्चा होती रही है। अगर समुद्र से नदी और नदी की ऊपरी धाराओं तक जाने का रास्ता बाधित होता है, तो इसका असर प्रजनन चक्र पर पड़ सकता है।
आज भागलपुर के स्थानीय बाजारों में हिलसा नियमित रूप से मिलने वाली मछली नहीं रह गई है। मछली कारोबारियों के मुताबिक, खास ग्राहकों की मांग पर इसे बंगाल की मंडियों से मंगाया जाता है। मीनी मार्केट, स्टेशन चौक और आदमपुर जैसे इलाकों में कारोबार करने वाले विक्रेताओं के अनुसार, इसकी उपलब्धता मौसम और आपूर्ति पर निर्भर करती है। बाहर से आने वाली मछली को बर्फ में सुरक्षित रखकर लंबी दूरी तक पहुंचाया जाता है। इस वजह से इसकी कीमत स्थानीय मछलियों के मुकाबले काफी ज्यादा हो जाती है।
हिलसा की कमी और ऊंची कीमत के बीच स्थानीय बाजार में 'मिर्का' मछली को एक विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है। कुछ स्थानीय लोग इसके स्वाद को हिलसा से मिलता-जुलता बताते हैं, हालांकि हिलसा के शौकीनों का कहना है कि दोनों के स्वाद और खुशबू की तुलना नहीं की जा सकती। भागलपुर के बंगाली समुदाय के लोगों के लिए यह सिर्फ स्वाद का मामला नहीं है। इलिस माछ कई परिवारों के खान-पान और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ी हुई है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भागलपुर की गंगा में हिलसा की पुरानी रौनक वापस आ सकती है। इसका जवाब सिर्फ मछली छोड़ने या पकड़ने से नहीं मिलेगा। इसके लिए गंगा के पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को बेहतर करना होगा। नदी के प्राकृतिक प्रवाह, पानी की गुणवत्ता, प्रजनन क्षेत्रों और प्रवासी मछलियों के रास्ते को सुरक्षित रखना जरूरी होगा। बैराज और अन्य संरचनाओं के आसपास प्रभावी फिश-पास की व्यवस्था, वैज्ञानिक निगरानी और मछली पकड़ने के टिकाऊ तरीके इस दिशा में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
Location : Bhagalpur
Published : 20 September 2026, 1:45 PM IST