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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की टिप्पणी
Raipur: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने फतवे को लेकर अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि फतवा कोई कानून नहीं, बल्कि सिर्फ एक राय है। इसका कोई कानूनी बंधन नहीं होता और न ही इसके जरिए किसी व्यक्ति के कानूनी अधिकारों को प्रभावित किया जा सकता है। कोर्ट ने यह टिप्पणी बालोद जिले की जामा मस्जिद की इंतजामिया समिति द्वारा जारी कथित फतवे को रद्द करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान की।
दरअसल, सुन्नी समुदाय के एक भाई-बहन ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर आरोप लगाया था कि उनके एक रिश्तेदार की शिया परिवार में शादी होने के बाद मस्जिद समिति ने उनके खिलाफ फतवा जारी किया। इसके चलते उनका सामाजिक बहिष्कार किया गया और उन्हें गैर-मुस्लिम घोषित कर दिया गया।
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याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि फतवे में यह भी कहा गया था कि शादी समारोह में शामिल होने वाले लोगों की अपनी शादियां भी अमान्य हैं और उन्हें अपने जीवनसाथी के साथ दोबारा निकाह करना होगा।
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद ने बालोद डीएसपी के नेतृत्व में हुई जांच का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता यह साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत पेश नहीं कर सके कि 23 अगस्त 2019 को जारी कथित फतवे के कारण उनका सामाजिक बहिष्कार किया गया था। वे यह भी साबित नहीं कर पाए कि उनके मौलिक अधिकारों का ऐसा कोई उल्लंघन हुआ है, जिसमें संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट के हस्तक्षेप की जरूरत हो।
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जांच में यह भी सामने आया कि फतवा जारी करने के पीछे याचिकाकर्ताओं में से एक के प्रति निजी दुश्मनी की बात थी। दरअसल, संबंधित व्यक्ति ने छत्तीसगढ़ राज्य वक्फ बोर्ड और अन्य अधिकारियों से मस्जिद समिति के कामकाज में अनियमितताओं और गबन की शिकायत की थी। शिकायतों के बाद वक्फ बोर्ड ने मौजूदा समिति को हटा दिया था और एक प्रशासक नियुक्त कर जांच शुरू कराई थी।
याचिकाकर्ताओं का दावा था कि फतवा उनके परिवार को परेशान करने और शिकायतकर्ता पर आरोप वापस लेने का दबाव बनाने के उद्देश्य से जारी किया गया था। हालांकि, पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलने के कारण हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करने से इनकार करने के बजाय उसे खारिज कर दिया।
Location : raipur
Published : 8 November 2026, 3:47 PM IST