Smoking से घटता नहीं, बल्कि बढ़ता है मानसिक तनाव; जानिए सिगरेट और डोपामाइन कनेक्शन की पूरी हकीकत

क्या सिगरेट सचमुच स्ट्रेस कम करती है? अमृता हॉस्पिटल की कंसल्टेंट साइकायट्री डॉ. गायत्री भाटिया के अनुसार, यह सिर्फ एक दिमागी भ्रम है। निकोटीन कुछ पल की राहत देकर आपको एंग्जायटी और मानसिक निर्भरता के खतरनाक चक्रव्यूह में फंसा देता है।

Post Published By: Tanya Chand
Updated : 31 May 2026, 2:36 PM IST

New Delhi: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में ऑफिस का डेडलाइन प्रेशर हो या घर की कोई परेशानी, मानसिक तनाव से निपटने के लिए बहुत से लोग सिगरेट का सहारा लेते हैं। अक्सर धूम्रपान करने वालों का यह तर्क होता है कि कश लगाने से उनका दिमाग शांत होता है और स्ट्रेस पल भर में गायब हो जाता है।

लेकिन क्या सिगरेट वाकई तनाव का इलाज है या फिर यह आपके दिमाग के साथ खेला जा रहा एक खतरनाक खेल है? इस उलझन को सुलझाने के लिए विशेषज्ञों ने बड़ा खुलासा किया है।

निकोटीन और डोपामाइन का दिमागी खेल

विशेषज्ञों के अनुसार, तंबाकू के अंदर मौजूद निकोटीन एक अत्यधिक नशीला और सक्रिय केमिकल है। जब कोई व्यक्ति सिगरेट का कश खींचता है, तो यह निकोटीन चंद सेकंड के भीतर फेफड़ों से होते हुए सीधे दिमाग तक पहुंच जाता है। मस्तिष्क में पहुंचते ही यह केमिकल 'डोपामाइन' नामक न्यूरोट्रांसमीटर को तेजी से रिलीज करता है।

डोपामाइन को हमारे शरीर में 'फील-गुड' या प्लेजर और रिवॉर्ड हार्मोन माना जाता है। इसी हार्मोन के अचानक बढ़ने से स्मोकर को कुछ समय के लिए एक सुखद शांति और तात्कालिक आराम का अहसास होता है, जिसे लोग तनावमुक्ति मान लेते हैं।

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राहत के बाद विड्रॉल सिम्टम्स का हमला

विशेषज्ञों का कहना है कि सिगरेट से मिलने वाली यह तथाकथित राहत बहुत ही क्षणिक होती है। जैसे ही शरीर में निकोटीन का स्तर गिरना शुरू होता है, वैसे ही इसके गंभीर नकारात्मक प्रभाव सामने आने लगते हैं। निकोटीन का लेवल कम होते ही व्यक्ति के व्यवहार में अचानक चिड़चिड़ापन, घबराहट, बेचैनी, अत्यधिक एंग्जायटी और किसी काम पर फोकस न कर पाने जैसी गंभीर समस्याएं पैदा होने लगती हैं। इन्हें चिकित्सा विज्ञान की भाषा में 'विड्रॉल सिम्टम्स' कहा जाता है।

तनाव कम नहीं, सिर्फ निकोटीन की तलब शांत

असल में, जब कोई स्मोकर तनाव के नाम पर दोबारा सिगरेट जलाता है, तो वह अपने जीवन की वास्तविक चिंताओं या समस्याओं को हल नहीं कर रहा होता। वह अनजाने में केवल निकोटीन की कमी से पैदा हुई अपनी शारीरिक बेचैनी और चिड़चिड़ेपन को शांत कर रहा होता है।

हैरानी की बात यह है कि धूम्रपान करने वाले लोग इसी बेचैनी के दूर होने को 'तनाव से राहत' समझने की भारी भूल कर बैठते हैं। कई वैज्ञानिक शोध भी यह साबित कर चुके हैं कि धूम्रपान न करने वालों की तुलना में सिगरेट पीने वाले लोगों में एंग्जायटी और डिप्रेशन का सामान्य स्तर हमेशा बहुत अधिक पाया जाता है।

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निर्भरता का चक्रव्यूह और मानसिक सेहत

सिगरेट आपके जीवन की किसी भी व्यावहारिक समस्या का समाधान नहीं है। डॉ. भाटिया चेतावनी देती हैं कि समय के साथ निकोटीन दिमाग की वायरिंग को इस कदर बदल देता है कि मस्तिष्क सामान्य रूप से काम करने या शांत महसूस करने के लिए भी सिगरेट पर पूरी तरह निर्भर हो जाता है।

यह निर्भरता समय के साथ आपके स्ट्रेस टॉलरेंस (तनाव सहने की क्षमता) को पूरी तरह खत्म कर देती है। अच्छी खबर यह है कि जो लोग सिगरेट पूरी तरह छोड़ देते हैं, उनके मूड में दीर्घकालिक और चमत्कारी सुधार देखा गया है। स्मोकिंग छोड़ने से न केवल एंग्जायटी का स्तर घटता है, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य भी काफी हद तक मजबूत होता है।

Location :  New Delhi

Published :  31 May 2026, 2:36 PM IST