
80s नोस्टैल्जिया और पेरेंटिंग (सोर्स- Pinterest)
New Delhi: इन दिनों सोशल मीडिया पर 80 और 90 के दशक का खुमार छाया हुआ है। हर कोई उस दौर की यादों और तस्वीरों के जरिए अपने बचपन के दिनों में लौट रहा है। लेकिन इस पुराने दौर के ट्रेंड के बीच सबसे दिलचस्प पहलू उस जमाने की पेरेंटिंग यानी परवरिश का है। 80 के दशक में माता-पिता को बच्चों को अच्छी आदतें सिखाने के लिए न तो कोई स्पेशल क्लास दिलानी पड़ती थी और न ही रोज-रोज समझाना पड़ता था।
बच्चे अपने माहौल से ही सब कुछ अपने आप सीख जाते थे। इसके उलट, आज के डिजिटल युग में पेरेंट्स को बच्चों में वही बुनियादी आदतें डालने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ रहा है। आइए जानते हैं वे 4 आदतें कौन सी हैं:
80 के दशक में शाम ढलते ही बच्चे खुद-ब-खुद गलियों और मैदानों में पहुंच जाते थे। उनके लिए बाहर खेलना दिनचर्या का सबसे पसंदीदा हिस्सा था। आज के समय में स्थिति बिल्कुल उलट है। मोबाइल, वीडियो गेम्स और टीवी की लत के कारण बच्चों को स्क्रीन से दूर करना और बाहर खेलने के लिए प्रेरित करना पेरेंट्स के लिए एक बड़ा टास्क बन गया है।
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पुराने समय में परिवार के साथ बैठना, रिश्तेदारों से बातचीत करना और दादी-नानी की कहानियां सुनना स्वाभाविक था, क्योंकि उस वक्त स्मार्टफोन जैसी कोई बाधा नहीं थी। आज ऑन-स्क्रीन एंटरटेनमेंट और रील्स स्क्रॉलिंग की वजह से बच्चे अपनों से कटने लगे हैं, जिसके चलते पेरेंट्स को उन्हें जबरन 'फैमिली टाइम' देने के लिए मनाना पड़ता है।
80s के बच्चों को बाजार से सामान लाने, मेहमानों को पानी देने या खाने की मेज लगाने जैसी छोटी-छोटी जिम्मेदारियां बिना कहे समझ आ जाती थीं। इससे वे बचपन से ही आत्मनिर्भर बन जाते थे। आज के पेरेंट्स पढ़ाई और एक्स्ट्रा एक्टिविटीज के दबाव में बच्चों को घर के कामों से दूर रखते हैं, जिससे वे जिम्मेदारी लेने में हिचकिचाते हैं।
उस दौर में हर चीज तुरंत नहीं मिलती थी- चाहे पसंदीदा टीवी शो का इंतजार करना हो या नई साइकिल का। इससे बच्चों में स्वाभाविक रूप से सब्र करने की आदत पड़ जाती थी। आज की 'वन-क्लिक' और इंस्टेंट डिलीवरी की दुनिया ने बच्चों में धैर्य खत्म कर दिया है, जिसे सिखाने के लिए पेरेंट्स को काफी संघर्ष करना पड़ रहा है।
Location : New Delhi
Published : 11 September 2026, 2:36 PM IST