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मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध के बीच IMF ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को लेकर गंभीर चेतावनी दी है। रिपोर्ट के मुताबिक ऊर्जा, खाद्य और सप्लाई चेन पर असर से महंगाई बढ़ सकती है और आर्थिक विकास धीमा पड़ सकता है, जिसका सबसे ज्यादा असर गरीब और आयात-निर्भर देशों पर पड़ेगा।
जंग से तबाही तय! (IMG: Google)
New Delhi: मिडिल ईस्ट में छिड़ी जंग अब सिर्फ मिसाइलों और हमलों तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसका असर धीरे-धीरे पूरी दुनिया की जेब पर पड़ने लगा है। हालात ऐसे बनते दिख रहे हैं, जैसे किसी बड़े आर्थिक ‘क्राइम सीन’ की शुरुआत हो चुकी हो- जहां सबसे पहले वार आम लोगों की थाली और जेब पर पड़ता है। International Monetary Fund यानी IMF ने साफ चेतावनी दी है कि अगर हालात नहीं संभले, तो यह जंग वैश्विक अर्थव्यवस्था को झकझोर सकती है, महंगाई बेकाबू हो सकती है और विकास की रफ्तार थम सकती है।
International Monetary Fund का कहना है कि मध्य पूर्व में जारी संघर्ष ने दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। यह असर सिर्फ युद्ध वाले देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि एशिया, यूरोप, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका तक इसकी लहर पहुंच रही है। IMF के मुताबिक, दुनिया पहले ही कई आर्थिक चुनौतियों से जूझ रही थी और अब यह जंग उस पर अतिरिक्त दबाव डाल रही है।
IMF ने साफ कहा है कि इस संकट का सबसे ज्यादा असर उन देशों पर पड़ रहा है, जो तेल और गैस के लिए दूसरे देशों पर निर्भर हैं। खासतौर पर एशिया और यूरोप के बड़े एनर्जी इंपोर्ट करने वाले देश इस समय सबसे ज्यादा दबाव में हैं। दुनिया का करीब 25-30 प्रतिशत कच्चा तेल और लगभग 20 प्रतिशत एलएनजी Strait of Hormuz के रास्ते सप्लाई होता है। ऐसे में इस क्षेत्र में तनाव बढ़ने का सीधा असर सप्लाई और कीमतों पर पड़ रहा है।
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IMF ने चेतावनी दी है कि इस जंग का सबसे बड़ा असर महंगाई के रूप में सामने आएगा। ईंधन महंगा होगा, ट्रांसपोर्ट खर्च बढ़ेगा और इसका असर हर चीज की कीमत पर पड़ेगा। साथ ही आर्थिक विकास की रफ्तार भी धीमी हो सकती है। यानी एक तरफ आम लोगों का खर्च बढ़ेगा और दूसरी तरफ कमाई के मौके कम हो सकते हैं।
IMF के अनुसार, इस पूरे संकट का सबसे ज्यादा असर गरीब और विकासशील देशों पर पड़ने वाला है। जिन देशों के पास सीमित आर्थिक संसाधन हैं, वे बढ़ती कीमतों का सामना करने में ज्यादा मुश्किल महसूस कर रहे हैं। खासतौर पर अफ्रीका और एशिया के कई देश, जो तेल आयात पर निर्भर हैं, अब महंगे दामों के बावजूद भी पर्याप्त सप्लाई हासिल नहीं कर पा रहे हैं।
यह जंग सिर्फ तेल और गैस तक सीमित नहीं है। IMF ने चेतावनी दी है कि खाद्य और उर्वरक की कीमतों में भी तेजी आ सकती है। मिडिल ईस्ट, अफ्रीका, एशिया-प्रशांत और लैटिन अमेरिका के कई हिस्सों में इसका असर दिखने लगा है। गरीब देशों में खाद्य संकट की आशंका बढ़ गई है और उन्हें बाहरी मदद की जरूरत पड़ सकती है।
एशिया के बड़े मैन्युफैक्चरिंग देशों में ईंधन और बिजली की कीमतें बढ़ने से उत्पादन लागत बढ़ रही है। इसका असर सीधे तौर पर उद्योगों और रोजगार पर पड़ सकता है। वहीं यूरोप में यह स्थिति 2021-22 के गैस संकट जैसी बन सकती है। Italy और United Kingdom जैसे देश ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं, जबकि France और Spain अपनी ऊर्जा विविधता के कारण कुछ हद तक सुरक्षित हैं।
जंग के कारण जहाजों के रूट बदलने पड़े हैं, जिससे ट्रांसपोर्ट और बीमा लागत बढ़ गई है। इसका असर दुनियाभर में सामान की कीमत और डिलीवरी टाइम पर पड़ रहा है। इसके अलावा खाड़ी क्षेत्र से मिलने वाली हीलियम जैसी जरूरी गैस की सप्लाई भी प्रभावित हो सकती है, जो सेमीकंडक्टर और मेडिकल उपकरणों में इस्तेमाल होती है।
इस पूरे संकट का असर वैश्विक वित्तीय बाजारों पर भी पड़ा है। शेयर बाजारों में गिरावट आई है, बॉन्ड यील्ड बढ़ी है और बाजार में उतार-चढ़ाव तेज हुआ है। हालांकि IMF का कहना है कि यह गिरावट अभी पिछले बड़े संकटों जितनी गंभीर नहीं है, लेकिन इससे वित्तीय परिस्थितियां सख्त हो गई हैं।
IMF की प्रबंध निदेशक Kristalina Georgieva ने कहा है कि दुनिया अनिश्चित दौर से गुजर रही है और कई देशों को मदद की जरूरत पड़ सकती है। उन्होंने साफ कहा कि जिन देशों के पास कम संसाधन हैं, उन्हें खासतौर पर सतर्क रहने की जरूरत है और सही आर्थिक नीतियां अपनानी होंगी।