ईरान मुश्किल में, फिर भी रूस-चीन दूर क्यों? इन 4 वजहों ने बदला पूरा समीकरण

अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच बड़ा सवाल है कि ईरान के करीबी सहयोगी रूस और चीन खुलकर उसके साथ क्यों नहीं खड़े हो रहे। विशेषज्ञों के मुताबिक इसके पीछे रणनीतिक, आर्थिक और वैश्विक टकराव से बचने जैसी कई वजहें हैं।

Post Published By: Tanya Chand
Updated : 7 March 2026, 9:49 AM IST
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Tehran: अमेरिका और इजरायल के साथ जारी संघर्ष के बीच सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि ईरान के दो बड़े सहयोगी रूस और चीन खुलकर उसके समर्थन में क्यों नहीं आ रहे हैं। दोनों देशों ने ईरान पर हुए हमलों की आलोचना जरूर की है और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की तत्काल बैठक बुलाने की मांग भी की है, लेकिन अभी तक सैन्य मदद देने से दूरी बनाए रखी है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे रणनीतिक, आर्थिक और कूटनीतिक कारण हैं।

रूस सीधे युद्ध में नहीं कूदना चाहता

रूस और ईरान के बीच पिछले कुछ वर्षों में संबंध काफी मजबूत हुए हैं। दोनों देशों ने 2025 में रणनीतिक साझेदारी का समझौता भी किया था। हालांकि यह समझौता सैन्य गठबंधन नहीं है, इसलिए रूस पर ईरान की रक्षा करने की कानूनी बाध्यता नहीं बनती। विश्लेषकों के मुताबिक रूस फिलहाल सीधे युद्ध में शामिल होने से बचना चाहता है। वह खुद को संभावित मध्यस्थ के रूप में भी पेश करने की कोशिश कर रहा है, ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी भूमिका बनी रहे और टकराव सीमित रहे।

चीन अपने आर्थिक हितों को लेकर सतर्क

चीन ईरान का बड़ा तेल खरीदार है और दोनों देशों के बीच मजबूत आर्थिक संबंध हैं। इसके बावजूद चीन खुले तौर पर ईरान के साथ खड़े होने से बच रहा है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि चीन के सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और अन्य खाड़ी देशों के साथ भी गहरे आर्थिक और व्यापारिक संबंध हैं। अगर चीन किसी एक पक्ष के साथ खुलकर खड़ा होता है तो इससे उसके अन्य साझेदार नाराज हो सकते हैं। इसलिए बीजिंग फिलहाल संतुलन की नीति अपनाए हुए है।

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पश्चिम एशिया में संतुलन बनाए रखने की रणनीति

रूस और चीन दोनों ही पश्चिम एशिया में अपने प्रभाव को बनाए रखना चाहते हैं। इसके लिए वे ईरान के साथ-साथ उसके विरोधी देशों के साथ भी संबंध बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। अगर दोनों देश खुलकर ईरान का समर्थन करते हैं तो क्षेत्र के अन्य देशों के साथ उनके संबंध प्रभावित हो सकते हैं। यही वजह है कि फिलहाल दोनों देश कूटनीतिक बयान और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर विरोध तक ही सीमित हैं।

अमेरिका से सीधा टकराव भी बड़ी वजह

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर रूस या चीन सीधे सैन्य मदद देते हैं तो इससे अमेरिका के साथ बड़ा वैश्विक टकराव हो सकता है। मौजूदा अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में दोनों देश ऐसे सीधे संघर्ष से बचना चाहते हैं। यही कारण है कि वे फिलहाल स्थिति पर नजर रख रहे हैं और बयानबाजी के जरिए अपनी स्थिति स्पष्ट कर रहे हैं।

ईरान में हमले की लेटेस्ट तस्वीर (Img- Internet)

रूस का बयान: ईरान ने हथियार नहीं मांगे

रूस ने गुरुवार को कहा कि ईरान ने उससे युद्ध में हथियार भेजने का कोई अनुरोध नहीं किया है। रूसी राष्ट्रपति कार्यालय क्रेमलिन के प्रवक्ता ने कहा कि इस मामले में ईरान की ओर से कोई आधिकारिक मांग नहीं आई है। रूस का यह भी आरोप है कि अमेरिका और इजरायल अपने हमलों के जरिए अरब देशों को इस संघर्ष में शामिल करने की कोशिश कर रहे हैं। रूसी विदेश मंत्रालय के मुताबिक हमलों के बाद भी तनाव कम होने के संकेत नहीं दिख रहे।

यूक्रेन की ड्रोन सहयोग की पेशकश

इस बीच यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने कहा है कि अमेरिका और पश्चिम एशिया के कुछ सहयोगी देश ईरान के ड्रोन का मुकाबला करने के लिए यूक्रेन के अनुभव में रुचि दिखा रहे हैं। उन्होंने कहा कि कई देशों से संभावित सहयोग पर बातचीत हुई है, लेकिन यह मदद तभी संभव होगी जब इससे यूक्रेन की अपनी सुरक्षा कमजोर न पड़े।

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चीन के विशेषज्ञ का आकलन

चीन के विदेश मामलों की विशेषज्ञ युन सुन ने कहा कि ईरान में मौजूदा हालात के बाद जो भी नई नेतृत्व व्यवस्था सामने आएगी, चीन उसके साथ काम करने के लिए तैयार रहेगा। हालांकि इसके लिए जरूरी होगा कि तेल आपूर्ति और साझा आर्थिक हित सुरक्षित रहें। उन्होंने यह भी कहा कि अगर लंबे समय तक संघर्ष के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल आपूर्ति प्रभावित होती है, तब चीन को अपनी मौजूदा रणनीति पर फिर से विचार करना पड़ सकता है।

Location : 
  • Tehran

Published : 
  • 7 March 2026, 9:49 AM IST

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