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हिंदी सिनेमा के अनुभवी फिल्ममेकर एमएम बेग का 70 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उनका शव घर में पड़ा मिला, जिसकी जानकारी पड़ोसियों की शिकायत के बाद सामने आई। 80–90 के दशक में सक्रिय रहे बेग ने कई नामी निर्देशकों संग काम किया और ‘छोटी बहू’ जैसी फिल्मों का निर्देशन किया। इंडस्ट्री में शोक है।
एमएम बेग का निधन (Image Source: Google)
New Delhi: हिंदी फिल्म इंडस्ट्री उस समय स्तब्ध रह गई जब दिग्गज फिल्म निर्माता एमएम बेग के निधन की खबर सामने आई। 70 वर्षीय बेग का शव उनके घर पर ही पड़ा मिला। बताया जा रहा है कि घर से तेज बदबू आने के बाद पड़ोसियों ने इसकी शिकायत की, जिसके बाद मामले का खुलासा हुआ।
इस दुखद खबर की पुष्टि उनके प्रचारक हनीफ ज़वेरी ने की। अचानक आई इस सूचना ने फिल्म जगत को गहरे सदमे में डाल दिया है। बेग लोकप्रिय बाल कलाकार बेबी गुड्डू के पिता भी थे और लंबे समय से फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े हुए थे। उनके निधन का तरीका जितना दुखद है, उतना ही चौंकाने वाला भी। इंडस्ट्री के कई लोगों ने इस घटना को बेहद पीड़ादायक बताया है और शोक संवेदनाएं व्यक्त की हैं।
भले ही आम दर्शकों के बीच एमएम बेग का नाम बहुत अधिक चर्चित न रहा हो, लेकिन हिंदी सिनेमा के गलियारों में उनका योगदान महत्वपूर्ण माना जाता है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत दिग्गज निर्देशकों के सहायक के रूप में की, जिनमें जे. ओम प्रकाश, विमल कुमार और राकेश रोशन शामिल हैं।
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उन्होंने 80 और 90 के दशक की कई व्यावसायिक फिल्मों में काम किया, जिनमें आदमी खिलौना है, जैसी करनी वैसी भरनी, कर्ज चुकाना है, काला बाजार और किशन कन्हैया जैसी फिल्में शामिल हैं।
उद्योग जगत के सहयोगियों के अनुसार, बेग तकनीकी रूप से बेहद दक्ष फिल्ममेकर थे। संवाद अदायगी और कलाकारों को प्रशिक्षित करने में उनकी खास पकड़ थी। कहा जाता है कि उन्होंने ऋतिक रोशन की पहली "फिल्म कहो ना... प्यार है" से पहले उच्चारण और संवाद अभ्यास में मदद की थी।
एक स्वतंत्र निर्देशक के तौर पर एमएम बेग की सबसे चर्चित फिल्म रही छोटी बहू, जिसमें दीपक तिजोरी और शिल्पा शिरोडकर ने मुख्य भूमिकाएं निभाईं। यह फिल्म बंगाली फिल्म "छोटों बौ" की रीमेक थी और एक पारंपरिक संयुक्त परिवार के रिश्तों को दर्शाती थी।
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‘छोटी बहू’ ने घरेलू भावनाओं और पारिवारिक संघर्षों को संवेदनशीलता से प्रस्तुत किया, जिसके कारण यह फिल्म आज भी उनके निर्देशन करियर की पहचान मानी जाती है। एमएम बेग का जाना हिंदी सिनेमा के एक ऐसे दौर का अंत है, जहां तकनीकी दक्षता और सादगी के साथ कहानियां कही जाती थीं। इंडस्ट्री ने एक अनुभवी मार्गदर्शक और शांत स्वभाव के सृजनकर्ता को खो दिया है।