जेब से रिश्वत के रुपये मिले, फिर भी बरी हुआ अकाउंटेंट! छत्तीसगढ़ HC ने बताया- दोष साबित करने के लिए क्या जरूरी

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने रिश्वत के एक मामले में अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि सिर्फ आरोपी के पास से दागी नोट बरामद होना दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं है।

Post Published By: Nidhi Kushwaha
Updated : 21 September 2026, 3:26 PM IST
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Raipur: रिश्वतखोरी के एक मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए सूरजपुर जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) कार्यालय के अकाउंटेंट मुरली प्रसाद चौधरी को बरी कर दिया है। अदालत ने कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत किसी आरोपी को दोषी ठहराने के लिए सिर्फ उसके पास से दागी नोट यानी रिश्वत के पैसे बरामद होना पर्याप्त नहीं है।

कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष को यह साबित करना जरूरी है कि आरोपी ने रिश्वत की मांग की और उसे स्वेच्छा से स्वीकार भी किया। उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड के मुताबिक फैसला 18 सितंबर 2026 को न्यायमूर्ति नरेश कुमार चंद्रवंशी की एकल पीठ ने सुनाया।

सूरजपुर DEO कार्यालय से जुड़ा था मामला

दरअसल, यह मामला सूरजपुर जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय में अकाउंटेंट के पद पर तैनात मुरली प्रसाद चौधरी से जुड़ा था। उनके खिलाफ रिश्वत मांगने का आरोप लगाया गया था। मामले में शिकायत के बाद एंटी करप्शन ब्यूरो की ओर से ट्रैप कार्रवाई की गई और आरोपी के पास से दागी रकम बरामद होने की बात सामने आई।

ट्रायल कोर्ट ने मार्च 2017 में आरोपी को दोषी ठहराया था। इसके बाद मुरली प्रसाद चौधरी ने उस फैसले को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने अपील पर सुनवाई के बाद निचली अदालत की दोषसिद्धि को निरस्त कर दिया और आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया।

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सिर्फ दागी नोट की बरामदगी से अपराध साबित नहीं

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में रिश्वतखोरी के मामलों में 'डिमांड' यानी रिश्वत की मांग को बेहद महत्वपूर्ण माना। अदालत के मुताबिक अभियोजन पक्ष अगर यह साबित नहीं कर पाता कि आरोपी ने अवैध रिश्वत की मांग की थी, तो केवल उसके पास से दागी रकम बरामद होने के आधार पर दोषसिद्धि कायम नहीं रखी जा सकती।

अदालत ने माना कि इस मामले में अभियोजन मांग और स्वीकृति के जरूरी तत्वों को संदेह से परे साबित नहीं कर पाया। दागी मुद्रा की बरामदगी और हाथ धुलाने की जांच जैसे साक्ष्य मौजूद होने के बावजूद वे अकेले दोषसिद्धि को कायम रखने के लिए पर्याप्त नहीं थे।

इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य में भी मिली खामियां

मामले में रिश्वत की कथित मांग को साबित करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य पर भी भरोसा किया गया था। लेकिन हाईकोर्ट ने इन साक्ष्यों की विश्वसनीयता को लेकर गंभीर सवाल पाए। न्यायिक रिकॉर्ड के मुताबिक इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्डिंग से जुड़ी कमियां, गवाहों के बयानों में विरोधाभास और मांग को स्पष्ट रूप से साबित न कर पाना अभियोजन के लिए महत्वपूर्ण कमजोरी रही। अदालत के सामने यह पर्याप्त रूप से स्थापित नहीं हो सका कि रिकॉर्डिंग में मौजूद बातचीत से आरोपी की ओर से रिश्वत की स्पष्ट मांग साबित होती है।

गवाहों के बयान भी नहीं दे पाए पूरा साथ

मामले में शिकायतकर्ता और साथ मौजूद गवाहों के बयानों को भी अदालत ने देखा। उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार अभियोजन के महत्वपूर्ण गवाह बाद में अपने पहले के कथित संस्करण से पीछे हट गए और रिश्वत की मांग तथा रकम स्वीकार किए जाने को लेकर अभियोजन की कहानी का पूरी तरह समर्थन नहीं किया।

ऐसी स्थिति में केवल बरामद रकम के आधार पर आरोप को साबित करना मुश्किल हो गया। हाईकोर्ट ने साक्ष्यों को समग्र रूप से देखने के बाद माना कि अभियोजन जरूरी कानूनी कसौटी पर मामला साबित करने में सफल नहीं रहा।

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सुप्रीम कोर्ट की नजीरों का भी जिक्र

रिश्वत के मामलों में मांग और स्वीकृति के महत्व को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहले भी कई फैसलों में स्पष्ट कर चुका है। न्यायिक सिद्धांत यह है कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत रिश्वत की मांग अपराध का आवश्यक तत्व है। सिर्फ रकम की बरामदगी, जब तक मांग और स्वीकृति के विश्वसनीय साक्ष्य मौजूद न हों, अपने आप में दोषसिद्धि का आधार नहीं बनती।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के इस फैसले में भी इसी कानूनी सिद्धांत को लागू किया गया। अदालत ने पाया कि मौजूदा मामले में अभियोजन पक्ष मांग और स्वीकृति को संदेह से परे साबित नहीं कर सका। हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट के दोषसिद्धि और सजा वाले फैसले को रद्द कर दिया। इसके साथ ही अकाउंटेंट मुरली प्रसाद चौधरी को आरोपों से बरी कर दिया गया।

Location :  Raipur

Published :  21 September 2026, 3:26 PM IST

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