
इलाहाबाद हाईकोर्ट (IMG: Pinterest)
Prayagraj: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मोटर दुर्घटना मुआवजे से जुड़े एक मामले में अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि किसी व्यक्ति की सामाजिक या पेशेवर हैसियत को उसकी आय तय करने का आधार नहीं बनाया जा सकता। आय का निर्धारण रिकॉर्ड पर उपलब्ध ठोस साक्ष्यों के आधार पर ही किया जाना चाहिए। इसी टिप्पणी के साथ कोर्ट ने पूर्व कैबिनेट मंत्री नंदलाल सिंह पटेल की सड़क हादसे में मौत के मामले में मुआवजा बढ़ाने की मांग वाली अपील खारिज कर दी।
मामला 15 मई 1999 का है। इलाहाबाद-रायबरेली मार्ग पर हुए सड़क हादसे में नंदलाल सिंह पटेल की मौत हो गई थी। इसके बाद मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण यानी ट्रिब्यूनल के सामने मुआवजे का दावा किया गया। ट्रिब्यूनल ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर नंदलाल सिंह पटेल की वार्षिक आय 90 हजार रुपये मानी थी। इसी आधार पर कुल 7,84,500 रुपये का मुआवजा निर्धारित किया गया था।
याची की ओर से हाईकोर्ट में दलील दी गई कि नंदलाल सिंह पटेल प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री रह चुके थे और पेशे से अधिवक्ता भी थे। इसलिए उनकी वास्तविक वार्षिक आय 1.60 लाख रुपये मानी जानी चाहिए थी। याची की ओर से यह भी कहा गया कि आयकर रिटर्न में उनकी सालाना आय 1.60 लाख रुपये दर्शाई गई थी। ऐसे में उनकी सामाजिक और पेशेवर स्थिति को देखते हुए ट्रिब्यूनल की ओर से 90 हजार रुपये सालाना आय निर्धारित करना कम था।
‘बालिग अपनी जिंदगी के फैसले खुद ले सकता है’, आयुष मलिक मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी
हाईकोर्ट ने याची की इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति की सामाजिक या पेशेवर हैसियत अपने आप उसकी आय साबित नहीं करती। आय निर्धारित करने के लिए रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों को देखा जाना जरूरी है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल आयकर रिटर्न दाखिल कर देने से उसमें दर्ज आय हर मामले में निर्णायक रूप से साबित नहीं हो जाती। इस मामले में 1.60 लाख रुपये की वार्षिक आय के समर्थन में पर्याप्त और संतोषजनक साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया था।
हाईकोर्ट ने मामले के रिकॉर्ड पर विचार करने के बाद कहा कि ट्रिब्यूनल ने नंदलाल सिंह पटेल की वार्षिक आय 90 हजार रुपये निर्धारित की थी। उपलब्ध साक्ष्यों को देखते हुए यह आय भी अपने आप में अधिक मानी गई थी। कोर्ट के मुताबिक, जब 1.60 लाख रुपये की आय के दावे को साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य मौजूद नहीं है और ट्रिब्यूनल द्वारा पहले ही 90 हजार रुपये की आय निर्धारित की जा चुकी है, तो मुआवजा बढ़ाने का कोई आधार नहीं बनता।
याची की ओर से मुआवजा तय करते समय भविष्य की संभावनाओं, व्यक्तिगत खर्च में कटौती और अन्य मदों में राशि बढ़ाने की मांग भी की गई थी। हाईकोर्ट ने इन दलीलों को भी स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि मोटर दुर्घटना मुआवजा न्यायसंगत और उचित होना चाहिए। मुआवजे की प्रत्येक मद को सिर्फ यांत्रिक तरीके से बढ़ाना जरूरी नहीं है।
अंततः इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कमला देवी की ओर से दाखिल अपील को खारिज कर दिया। इसके साथ ही मोटर दुर्घटना ट्रिब्यूनल की ओर से निर्धारित 7,84,500 रुपये के मुआवजे में बढ़ोतरी की मांग स्वीकार नहीं की गई।
Location : Prayagraj
Published : 18 September 2026, 2:00 PM IST