गोरखपुर में 2020 के दहेज हत्या मामले में कोर्ट ने तीन आरोपियों को दोषी ठहराते हुए 7-7 साल की सजा सुनाई है। “ऑपरेशन कनविक्शन” अभियान के तहत पुलिस और अभियोजन की मजबूत पैरवी से यह फैसला संभव हो सका।

प्रतिकात्मक फोटो (IMG: Google)
Gorakhpur: गोरखपुर में दहेज की लालच में एक जिंदगी को खत्म कर देने वाले मामले में आखिरकार न्याय की मुहर लग गई है। करीब पांच साल तक चली कानूनी लड़ाई के बाद अदालत ने सख्त रुख अपनाते हुए तीन आरोपियों को दोषी करार दिया और उन्हें जेल भेजने का आदेश दे दिया। यह फैसला सिर्फ एक केस का अंत नहीं, बल्कि समाज को एक कड़ा संदेश भी है कि दहेज के नाम पर होने वाले अत्याचार अब बर्दाश्त नहीं किए जाएंगे।
पूरा मामला वर्ष 2020 का है, जब थाना सिकरीगंज में दहेज हत्या का मुकदमा दर्ज किया गया था। इस केस को मु0अ0सं0 54/2020 के तहत दर्ज किया गया, जिसमें भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए और 304बी के साथ-साथ दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धाराएं 3/4 लगाई गई थीं।
अदालत ने कुलदीप, रामअचल विश्वकर्मा और सोनमति को दोषी करार दिया। ये तीनों आरोपी थाना सिकरीगंज क्षेत्र के शिवपुर गांव के रहने वाले हैं। कोर्ट ने तीनों को 7-7 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। इसके साथ ही प्रत्येक पर 6,000 रुपये का अर्थदंड भी लगाया गया है।
इस पूरे मामले में “ऑपरेशन कनविक्शन” अभियान की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही। उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा चलाया जा रहा यह अभियान गंभीर अपराधों में तेजी से सजा सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया है। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक गोरखपुर के निर्देशन में मॉनिटरिंग सेल और थाना स्तर पर तैनात पुलिसकर्मियों ने इस केस की लगातार निगरानी की। हर तारीख पर केस को मजबूती से रखा गया और कोई भी कड़ी कमजोर नहीं पड़ने दी गई।
इस केस में अभियोजन पक्ष की ओर से एडीजीसी रविन्द्र सिंह और श्रद्धानन्द पाण्डेय ने प्रभावी बहस की। उन्होंने अदालत के सामने सभी साक्ष्यों को मजबूती से पेश किया और यह साबित किया कि आरोपियों ने दहेज के लिए उत्पीड़न किया, जिसके कारण यह घटना हुई।
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इस फैसले के बाद जहां पीड़ित परिवार को न्याय मिला है, वहीं समाज में भी एक मजबूत संदेश गया है। दहेज जैसी कुप्रथा के खिलाफ यह फैसला एक चेतावनी है कि ऐसे अपराध करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा।