अन्नामलाई का अर्श से फर्श तक का सफर: क्या तमिलनाडु भाजपा में खत्म हो गया ‘सिंघम’ का दौर?

तमिलनाडु भाजपा के पूर्व अध्यक्ष के. अन्नामलाई कैसे महज चार साल में पार्टी के सबसे चमकदार चेहरे से हाशिए पर पहुंच गए? जानिए गठबंधन की मजबूरी और उनके राजनीतिक भविष्य के अनसुलझे सवाल।

Post Published By: Tanya Chand
Updated : 2 June 2026, 2:12 PM IST

Chennai: लगभग चार साल पहले, दक्षिण भारत के राजनीतिक क्षितिज पर एक नया और ऊर्जावान चेहरा उभरा। IPS की प्रतिष्ठित नौकरी छोड़कर राजनीति में कदम रखने वाले के. अन्नामलाई को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने हाथों-हाथ लिया। अपनी सख्त पुलिस अधिकारी की छवि, युवाओं में आकर्षण और तमिल व अंग्रेजी दोनों भाषाओं पर बेहतरीन पकड़ के कारण वे जल्द ही अलग नजर आने लगे।

पार्टी ने उन पर इतना भरोसा जताया कि महज एक साल के भीतर उन्हें तमिलनाडु भाजपा का अध्यक्ष बना दिया गया। यह एक ऐसा पद था, जिसके लिए जमीनी कार्यकर्ता वर्षों तक संघर्ष करते हैं। भाजपा अन्नामलाई को दक्षिण भारत में अपने सबसे बड़े और महत्वाकांक्षी प्रयोग के रूप में देख रही थी।

शीर्ष नेतृत्व का भरोसा और लोकप्रियता का चरम

अन्नामलाई ने राज्य में पैर पसारने के लिए आक्रामक रुख अपनाया। उन्होंने सत्तारूढ़ द्रमुक (DMK) सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला और "एन मन्न, एन मक्कल" (मेरी भूमि, मेरे लोग) नाम से एक व्यापक पदयात्रा निकाली। इस यात्रा ने राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी और सोशल मीडिया पर उनकी लोकप्रियता को चरम पर पहुंचा दिया।

दिल्ली के शीर्ष नेतृत्व, विशेषकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह तक उनकी सीधी पहुंच थी। फरवरी 2024 में तिरुपुर में एक रैली के दौरान पीएम मोदी ने न केवल उनकी पीठ थपथपाई, बल्कि उनके कंधे पर हाथ रखकर अपना स्नेह भी प्रदर्शित किया। उस वक्त ऐसा लगा कि अन्नामलाई तमिलनाडु में भाजपा के निर्विवाद चेहरा बन चुके हैं।

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आक्रामक शैली और गठबंधन में दरार

अन्नामलाई की यही आक्रामक शैली धीरे-धीरे उनके लिए मुसीबत बनने लगी। उन्होंने भाजपा को राज्य में एक स्वतंत्र और मजबूत ताकत बनाने के चक्कर में अपनी सहयोगी पार्टी अन्नाद्रमुक (AIADMK) के दिवंगत नेताओं और जयललिता जैसी कद्दावर शख्सियतों पर सीधे सवाल उठाने शुरू कर दिए। इसका नतीजा यह हुआ कि 2023 में भाजपा और AIADMK का पुराना गठबंधन टूट गया।

हालांकि, शुरुआती दौर में दिल्ली के केंद्रीय नेतृत्व ने अन्नामलाई की इस स्वतंत्र रणनीति का समर्थन किया, लेकिन चुनावी नतीजों और जमीनी हकीकत ने जल्द ही आलाकमान को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया।

दिल्ली की बदली रणनीति और अन्नामलाई का किनारा

साल 2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव आते-आते भाजपा को यह अहसास हो गया कि DMK को सत्ता से बेदखल करने के लिए एक मजबूत और बड़े गठबंधन की जरूरत है। इसके लिए AIADMK को वापस साथ लाना अनिवार्य था। अप्रैल 2025 में गृह मंत्री अमित शाह ने खुद AIADMK के साथ दोबारा गठबंधन का एलान किया और स्पष्ट किया कि यह चुनाव एडप्पादी के. पलानीस्वामी (EPS) के नेतृत्व में लड़ा जाएगा। गठबंधन की इस नई मजबूरी के बाद अन्नामलाई को किनारे कर दिया गया और उनकी जगह नैनार नागेंद्रन को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया, जो सहयोगियों के लिए अधिक स्वीकार्य चेहरा थे।

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2026 चुनाव से गायब और भाषा विवाद

राजनीतिक हलकों में हर कोई उस वक्त हैरान रह गया जब 2026 के विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा उम्मीदवारों की सूची से अन्नामलाई का नाम गायब था। हालांकि उन्होंने दावा किया कि यह उनका अपना फैसला था, लेकिन चर्चा यही रही कि AIADMK के दबाव के कारण उन्हें टिकट नहीं मिला। इसी बीच, केंद्रीय भाषा नीति और सीबीएसई (CBSE) के त्रि-भाषा फॉर्मूले की आलोचना करके उन्होंने पार्टी लाइन से अलग रुख अपनाया।

तमिलनाडु जैसे राज्य में, जहाँ भाषा एक बेहद संवेदनशील और भावनात्मक मुद्दा है, अन्नामलाई के इस कदम को तमिल पहचान स्थापित करने की एक स्वतंत्र कोशिश के रूप में देखा गया, जिसने पार्टी से उनकी दूरी और बढ़ा दी।

आगे की राह: भविष्य के गर्भ में क्या?

अन्नामलाई का राजनीतिक भविष्य अब बड़े सवालों के घेरे में है। राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग मानता है कि गठबंधन की व्यावहारिक राजनीति के आगे अन्नामलाई की आक्रामक छवि भाजपा के लिए बोझ बन गई। वहीं, दूसरा वर्ग यह मानता है कि पार्टी ने उन्हें पूरी तरह खारिज नहीं किया है, बल्कि उन्हें भविष्य में किसी राष्ट्रीय या अलग भूमिका के लिए तैयार किया जा रहा है। अब देखना दिलचस्प होगा कि तमिलनाडु की राजनीति का यह 'सिंघम' क्या भाजपा के भीतर रहकर अपनी नई भूमिका का इंतजार करता है या फिर अपनी अलग राजनीतिक राह चुनता है।

Location :  Chennai

Published :  2 June 2026, 1:25 PM IST