नैनीताल में बसंती राणा के नेतृत्व में वैष्णवी स्वयं सहायता समूह प्राकृतिक हर्बल रंग तैयार कर आत्मनिर्भरता की मिसाल बन रहा है। होली से पहले इन सुरक्षित और रासायनिक–मुक्त रंगों की मांग तेजी से बढ़ी है, जिससे समूह की यह पहल महिला सशक्तिकरण की प्रेरक कहानी बन गई है।

नैनीताल में हर्बल रंगों की खुशबू
नैनीताल: होली के रंगों में घुली खुशबू इस बार नैनीताल जिले की एक महिला समूह की मेहनत भी कहानी बनकर उभर रही है। वैष्णवी स्वयं सहायता समूह की संचालिका बसंती राणा ने यह साबित कर दिया है कि अवसर, संकल्प और सरकारी सहयोग मिल जाए तो गांव की महिलाएं भी अपने पैरों पर मजबूती से खड़ी हो सकती हैं।
प्राकृतिक तत्वों से बने हर्बल रंग
होली नज़दीक है, और इसी को देखते हुए समूह इन दिनों फूलों, पालक, गाजर और चुकंदर जैसे प्राकृतिक तत्वों से बने हर्बल रंग तैयार कर रहा है। इन रंगों की खूबी यह है कि ये पूरी तरह रसायन मुक्त हैं और त्वचा पर किसी तरह का दुष्प्रभाव नहीं छोड़ते। यही वजह है कि इनके लिए स्थानीय बाज़ारों से लेकर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म तक से लगातार ऑर्डर आ रहे हैं।
पूरी तरह स्वदेशी और हाथों से तैयार
बसंती राणा की अगुवाई में समूह आज महिला सशक्तिकरण का एक मजबूत स्तंभ बन चुका है। सीजन के अनुसार इनके काम भी बदलते रहते हैं रक्षा बंधन पर राखियां, करवाचौथ पर ऐपन कला से सजी थालियां, दिवाली पर फूलों की मालाएं और होली पर हर्बल रंग। इसके साथ ही समूह धूप अगरबत्ती, मसाले, अचार और कई तरह के घरेलू उत्पाद भी बनाता है, जो पूरी तरह स्वदेशी और हाथों से तैयार किए जाते हैं।
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गांव की महिलाओं के लिए प्रेरणा
आर्थिक मजबूती की बात करें तो वैष्णवी समूह की वार्षिक कमाई गांव की महिलाओं के लिए प्रेरणा से कम नहीं है। हर साल खेल महाकुंभ के दौरान कैंटीन संचालन से करीब आठ लाख रुपये की आय होती है। वहीं सालभर उत्पादों की बिक्री से लगभग चार लाख रुपये अतिरिक्त कमाए जाते हैं। महिला उद्यमिता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से सरकार ने समूह को पंद्रह लाख रुपये का ऋण भी उपलब्ध कराया, जिसके बाद उत्पादन क्षमता बढ़ी और काम का दायरा भी फैला।
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आत्मविश्वास और बदलाव की कहानी
बसंती राणा और उनके समूह की यह यात्रा सिर्फ आर्थिक सशक्तिकरण की नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और बदलाव की कहानी है। यह दिखाती है कि आत्मनिर्भर भारत की असली नींव गांवों की महिलाओं के हाथों में ही मजबूत होती है।