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स्कॉटिश पैटर्न पर बनी यह भव्य इमारत आज भी अपनी उत्कृष्ट सुंदरता, हरे-भरे परिसर और स्थापत्य वैभव के कारण लोगों को आकर्षित करती है। ब्रिटिश काल में तैयार किए गए इस भवन को आजादी के बाद राजभवन का रूप मिला और इसकी शान समय के साथ और निखरती चली गई।
नैनीताल के राजभवन की शान
Nainital: नैनीताल की पहाड़ियों के बीच खड़ा राजभवन सिर्फ एक प्रशासनिक भवन नहीं, बल्कि ब्रिटिश दौर की उस वास्तुकला का शानदार नमूना है, जो आज भी मजबूती और खूबसूरती के साथ लोगों का ध्यान खींचता है। स्कॉटिश शैली पर आधारित इस भवन की नींव 27 अप्रैल 1897 को रखी गई थी और इसे उत्तर पश्चिम प्रांत के तत्कालीन गवर्नर के निवास के रूप में तैयार किया गया था।
अंग्रेजों ने इसे यूरोपियन पैटर्न और गॉथिक डिज़ाइन के मेल से इस तरह बनाया कि इमारत ब्रिटेन के किसी ऐतिहासिक महल की छवि उकेरती दिखती है।
उत्तराखंड की प्रशासनिक विरासत का प्रतीक
राजभवन के निर्माण में आर्किटेक्ट स्वैंस और मुख्य अभियंता एएफओ डब्ल्यू आर्ट्ल जैसे विशेषज्ञों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। ई-आकार में बनी इस इमारत को मजबूत नींव, स्थानीय पत्थरों, इंग्लैंड से आयात की गई टाइलों और एशलर फिनिशिंग ने और भी खास बनाया। आज़ादी के बाद इसका नाम बदलकर राजभवन रखा गया और तब से यह उत्तराखंड की प्रशासनिक विरासत का प्रतीक बना रहा है।
भव्यता पहली नज़र में ही राजसी एहसास
220 एकड़ भूमि में फैले इस परिसर का ज्यादातर हिस्सा आज भी घने जंगलों से घिरा है। 1975 में 75 एकड़ के हिस्से को विकसित कर यहां गोल्फ कोर्स बनाया गया, जो आज भी इस परिसर की खूबसूरती में इज़ाफ़ा करता है। 1994 में राजभवन को आम लोगों के लिए खोला गया, जिसके बाद पर्यटकों के बीच यह विशेष आकर्षण का केंद्र बन गया।
इतिहासकारों के अनुसार, राजभवन की बनावट ब्रिटेन के बकिंघम पैलेस से प्रेरित बताई जाती है और यही कारण है कि इसकी भव्यता पहली नज़र में ही राजसी एहसास कराती है।
इमारत को मजबूत बनाने के लिए कई सुधार
नैनीताल में राजभवन के निर्माण से पहले भी कई भवन मौजूद थे, लेकिन 1862 के बाद उत्तर पश्चिम प्रांत के गवर्नरों के नियमित प्रवास ने इस क्षेत्र के महत्व को बढ़ा दिया। दो मंजिला इस भवन में 115 कमरे हैं और स्विमिंग पूल जैसी आधुनिक सुविधाएं भी शामिल की गई थीं। समय समय पर होने वाले भूगर्भीय परीक्षणों के आधार पर इमारत को मजबूत बनाने के लिए कई सुधार भी किए गए।
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ऐतिहासिक पहचान का हिस्सा
राजभवन नैनीताल प्रदेश का पहला गुरुद्वारा भी अपने भीतर समेटे हुए है। परिसर में चीड़, बान्ज, तुन, देवदार, सुरई, अखरोट और चिनार जैसे अनगिनत पेड़ इसकी सुंदरता को प्राकृतिक आभा प्रदान करते हैं। इमारत की खिड़कियां, दरवाज़े और फर्नीचर शीशम, साटन, साल और सायप्रस की लकड़ी से तैयार किए गए हैं, जबकि ब्रिटेन से आयातित पीतल और लोहे का नल-फिटिंग का सामान इसे और भी विशेष बनाता है।
सजावट के लिए कालीन फतेहपुर, आगरा और लखनऊ से मंगाए गए थे, जो आज भी इसकी ऐतिहासिक पहचान का हिस्सा हैं।
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वन महोत्सव की शुरुआत भी यहीं से हुई थी और आज भी यह परिसर इस बात की मिसाल है कि प्राकृतिक धरोहर और वास्तुकला का संगम जब एक जगह मिलता है, तो वह इतिहास का जीवंत अध्याय बन जाता है। राजभवन को इस तरह डिज़ाइन किया गया कि हर कमरे में सूर्य की रोशनी पहुँच सके, जो इसकी इंजीनियरिंग की बारीकियों को और भी खासी महत्व देती है।
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