Muzaffarnagar: सगा बेटा दे रहा ₹8000 महीना, फिर भी सौतेले बेटे पर केस, हाईकोर्ट ने महिला को दिया झटका

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि किसी मां को उसके सगे बेटे से नियमित रूप से भरण-पोषण की राशि मिल रही है, तो वह उसी आधार पर सौतेले बेटे से भी भरण-पोषण की मांग नहीं कर सकती।

Post Published By: Komal Chauhan
Updated : 16 July 2026, 3:44 PM IST

Prayagraj: उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर फैमिली कोर्ट में एक महिला ने अपने बेटे से गुजारा-भत्ता (मेंटेनेंस) की मांग की थी। सुनवाई के बाद, फैमिली कोर्ट ने उसके सगे बेटे को हर महीने 8,000 रू गुजारा-भत्ता देने का आदेश दिया। हालाँकि, इस फैसले से असंतुष्ट होकर महिला इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुxची और मांग की कि उसके सौतेले बेटे के खिलाफ भी गुजारा-भत्ता देने का आदेश जारी किया जाए।

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सगे बेटे से आर्थिक मदद मिलना

सुनवाई के दौरान, सरकार ने कोर्ट को बताया कि महिला का सगा बेटा आर्थिक रूप से सक्षम है और कोर्ट के आदेश के अनुसार नियमित रूप से गुजारा-भत्ते की रकम दे रहा है।नतीजतन, महिला की बुनियादी जरूरतें पूरी हो रही हैं और उसकी देखभाल का इंतजाम पहले से ही सुनिश्चित है।

कोर्ट ने गुजारा-भत्ता तय करने की प्रक्रिया बताई

जस्टिस लक्ष्मी कांत शुक्ला की अध्यक्षता वाली सिंगल-जज बेंच ने कहा कि गुजारा-भत्ते के मामलों में, कोर्ट सबसे पहले यह देखती है कि क्या आवेदक अपना खर्च उठाने में सक्षम है।इसके अलावा, कोर्ट यह भी देखती है कि जिस व्यक्ति से गुजारा-भत्ते की मांग की जा रही है, क्या उसके पास पर्याप्त आर्थिक साधन हैं। हालात के आधार पर, कोर्ट यह तय करती है कि गुजारा-भत्ता देने की जिम्मेदारी किसकी है और किस अनुपात में है।

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सौतेले बेटे पर कोई अतिरिक्त जिम्मेदारी नहीं

अपने आदेश में, हाई कोर्ट ने साफ किया कि चूँकि महिला को पहले से ही अपने सगे बेटे से नियमित आर्थिक मदद मिल रही है, इसलिए उसी आधार पर सौतेले बेटे पर गुजारा-भत्ता देने की जिम्मेदारी डालना उचित नहीं होगा। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में फैमिली कोर्ट के फैसले में दखल देने का कोई ठोस आधार नहीं है। इसलिए, महिला की क्रिमिनल रिविजन याचिका खारिज कर दी गई।

Location :  Prayagraj

Published :  16 July 2026, 2:42 PM IST