
इलाज की तलाश में भटकती रही मासूम
Hamirpur: यह सिर्फ एक नवजात बच्ची की मौत की कहानी नहीं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था पर खड़े होते उन सवालों की कहानी है, जिनका जवाब आज भी कोई नहीं दे पा रहा। हमीरपुर का एक किसान अपनी पोती को बचाने के लिए कानपुर से लखनऊ तक दौड़ता रहा। कभी वेंटिलेटर नहीं मिला, कहीं विशेषज्ञ नहीं था तो कहीं ऑपरेशन की व्यवस्था नहीं बताई गई। पांच अस्पतालों की चौखट पर मदद की गुहार लगाने के बावजूद परिवार को राहत नहीं मिली और आखिरकार मासूम जिंदगी की जंग हार गई।
हमीरपुर के नारायणनगर निवासी किसान इंद्रबाबू ने बताया कि उनकी पोती का जन्म 28 मई की सुबह एक निजी अस्पताल में हुआ था। जन्म के कुछ ही देर बाद बच्ची को सांस लेने में परेशानी होने लगी। घबराए परिजन उसे तत्काल जिला अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां उसे भर्ती कर लिया गया।
परिजनों के मुताबिक बाद में डॉक्टरों ने बताया कि नवजात की खाने की नली में गंभीर समस्या है और उसका इलाज जिला अस्पताल में संभव नहीं है। इसके बाद बच्ची को कानपुर के हैलट अस्पताल रेफर कर दिया गया। परिवार को उम्मीद थी कि बड़े अस्पताल में उनकी बच्ची को नई जिंदगी मिल जाएगी, लेकिन मुश्किलों का सफर यहीं से शुरू हुआ।
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बच्ची के पिता मनोज और चाचा शुभम उसे लेकर हैलट अस्पताल पहुंचे। परिजनों का आरोप है कि वहां डॉक्टरों ने बच्ची को तुरंत दूसरे स्थान पर ले जाने की सलाह दी। परिवार का कहना है कि उन्हें बताया गया कि बच्ची के कारण अन्य बच्चों में संक्रमण फैल सकता है। इसके बाद उन्होंने एंबुलेंस का इंतजाम किया और जो थोड़ी-बहुत जमा पूंजी बची थी, उसे खर्च कर लखनऊ के लिए रवाना हो गए।
लखनऊ पहुंचकर परिजन सबसे पहले केजीएमयू गए। वहां पर्चा बनने के बाद भर्ती की उम्मीद थी, लेकिन परिवार का आरोप है कि उन्हें बताया गया कि वेंटिलेटर उपलब्ध नहीं है। इसके बाद वे राम मनोहर लोहिया अस्पताल पहुंचे। वहां भी इलाज शुरू होने की जगह उन्हें दूसरे अस्पताल जाने की सलाह दी गई। डॉक्टरों ने कहा कि इस बीमारी के लिए जरूरी विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं हैं और बच्ची को एसजीपीजीआई ले जाना होगा। आखिरी उम्मीद लेकर परिवार एसजीपीजीआई पहुंचा, लेकिन वहां भी उन्हें राहत नहीं मिली। परिजनों का आरोप है कि अस्पताल में कहा गया कि इस तरह के ऑपरेशन की तत्काल व्यवस्था नहीं है और बाद में आने को कहा गया।
लगातार अस्पतालों के चक्कर काटते-काटते परिवार पूरी तरह टूट चुका था। आर्थिक स्थिति पहले ही खराब थी और इलाज की उम्मीदें भी खत्म होती जा रही थीं। निराश होकर जब परिवार हमीरपुर लौट रहा था, तब कानपुर के जेके चौराहे पर पहुंचकर इंद्रबाबू की हिम्मत जवाब दे गई। वह अपनी नवजात पोती को सीने से लगाए फ्लाईओवर के नीचे जमीन पर बैठ गए। यह तस्वीर उस दर्द को बयां कर रही थी, जिसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है।
मामले को लेकर बाल रोग विभागाध्यक्ष डॉ. शैलेंद्र गौतम ने कहा कि उन्हें इस तरह के मामले की जानकारी मिली है और जांच कराई जा रही है। उन्होंने बताया कि अस्पताल में पीडियाट्रिक सर्जरी की सुविधा उपलब्ध है और यह पता लगाया जा रहा है कि बच्ची कब अस्पताल आई थी और उसके इलाज को लेकर क्या स्थिति रही।
Location : Hamirpur
Published : 2 June 2026, 3:51 PM IST