पाठा क्षेत्र का वह बेताज बादशाह: जिसके एक इशारे और ‘आशीर्वाद’ से फर्श से अर्श तक पहुंच जाते थे सूबे के सांसद-विधायक!

चित्रकूट के झलमल जंगल में छिपे खूंखार डकैत ददुआ के आतंक, राजनीति में दखल और एसटीएफ के ऐतिहासिक एनकाउंटर की पूरी अनकही दास्तान।

Post Published By: Suresh Prajapati
Updated : 8 September 2026, 12:43 PM IST

Lucknow: 1970 के दशक से लेकर 2018 तक बुंदेलखंड के चित्रकूट, बांदा, फतेहपुर, प्रतापगढ़ और मिर्जापुर के जंगल डकैतों की बंदूकों की गड़गड़ाहट से थर्राते रहते थे। इस इलाके का पाठा क्षेत्र लंबे समय तक पानी की कमी के साथ-साथ अपराध और आतंक की गिरफ्त में रहा। पुलिस भी इन जंगलों में जाने से कतराती थी, जिसके चलते डकैत खुलेआम तांडव मचाते थे। इसी खौफनाक माहौल के बीच एक ऐसा नाम उभरा, जिसकी तूती पूरे क्षेत्र में बोलती थी- शिव कुमार पटेल उर्फ ददुआ। ददुआ सिर्फ एक अपराधी नहीं था, बल्कि वह उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश दोनों राज्यों में समानांतर सरकार चला रहा था।

पिता की हत्या ने बना दिया था 'गुनाहों का देवता'

ददुआ के बागी बनने की कहानी बेहद दर्दनाक और खौफनाक थी। चित्रकूट के रैपुरा थाना क्षेत्र के देवकली गांव में जन्मे राम प्यारे पटेल के बड़े बेटे ददुआ की जिंदगी तब पूरी तरह बदल गई, जब एक जमींदार जगन्नाथ ने उसके पिता की कुल्हाड़ी से काटकर हत्या कर दी। इसके बाद 1975 में उसे भैंस चोरी के एक झूठे मुकदमे में भी फंसा दिया गया। इस बेइज्जती और अपनों के खून का बदला लेने के लिए उस 17 साल के पतले-दुबले लड़के ने बंदूक थाम ली। उसने अपने पिता के हत्यारे जगन्नाथ समेत नौ लोगों को मौत के घाट उतार दिया और जगन्नाथ की खोपड़ी में गोलियां उतारकर विधिवत रूप से बागी दुनिया में कदम रख दिया। रामू का पुरवा गांव में 19 जुलाई 1986 को एक साथ नौ लोगों का नरसंहार करने के बाद वह इस जंगल का बेताज बादशाह बन गया।

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मुखबिरों के लिए काल और गरीबों के लिए 'रॉबिनहुड'

ददुआ अपने दुश्मनों और पुलिस मुखबिरों के प्रति बेहद क्रूर था। उसका साफ कहना था कि उसे मुखबिरी बिल्कुल पसंद नहीं है और जो भी मुखबिर निकलेगा, उसे चुन-चुनकर खत्म कर दिया जाएगा। उसने 2001 में लोहघटा गांव में पुलिस मुखबिरी के शक में चंदन यादव की गर्दन काटकर उसे बांस में लटकाकर पूरे गांव में घुमाया था। इसके अलावा 24 से ज्यादा पुलिस मुखबिरों को मौत के घाट उतारना, दिनदहाड़े पेट्रोल पंप कारोबारी का अपहरण करना और 1992 में मड़ैयन गांव में तीन लोगों को मारकर गांव में आग लगा देना उसके खौफ की गवाही देता है।

लेकिन, इसका दूसरा पहलू भी था। एक तरफ जहां वह आतंक का पर्याय था, वहीं शोषित, वंचित और विशेषकर कुर्मी-पटेल समाज के गरीबों के लिए वह किसी मसीहा से कम नहीं था। वह जरूरतमंदों की बेटियों की शादी में आर्थिक मदद करता, उनके विवादों को सुलझाता और 'रॉबिनहुड' की छवि बना कर रखता था। बुंदेलखंड और मध्य प्रदेश के सीमावर्ती जिलों में उसका ऐसा प्रभाव था कि एक अनुमान के मुताबिक उसके गिरोह पर नियंत्रण पाने के लिए राज्य सरकारों द्वारा करीब 100 करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके थे।

राजनीतिक गलियारों में दखल और नेताओं का दरबार

ददुआ का प्रभाव केवल अपराध जगत तक सीमित नहीं था, बल्कि वह राजनीति की भी धुरी बन चुका था। शुरुआत में उसे बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का संरक्षण मिला, जिससे 2002 में मायावती की सरकार बनने में उसके प्रभाव वाले क्षेत्रों की अहम भूमिका रही। इसके बाद 2004 के बाद उसने समाजवादी पार्टी (सपा) का दामन थाम लिया। बुंदेलखंड की 10 से 20 विधानसभा व लोकसभा सीटों पर उसका सीधा प्रभाव था। चुनाव के दौरान वह अपने समर्थन का फरमान जारी करता था। स्थिति यह थी कि बांदा, चित्रकूट, इलाहाबाद, सतना, छतरपुर और पन्ना के जो भी नेता उसके दरबार में हाजिरी लगा लेते थे, उनका सांसद या विधायक बनना तय माना जाता था। ताकत का आलम यह था कि ददुआ ने खुद अपने भाई बालकुमार पटेल को सांसद और अपने पुत्र वीर सिंह को विधायक बनवा दिया था। फतेहपुर में तो एक समय उसकी मूर्ति तक स्थापित कर दी गई थी, हालांकि यमुना पार करते ही वही लोग उसे एक खालिस डकैत के रूप में देखते थे।

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ऑपरेशन 'ददुआ': एसटीएफ का ऐतिहासिक एनकाउंटर

ददुआ के बढ़ते साम्राज्य और राजनीतिक दखल को खत्म करने के लिए 2007 में उत्तर प्रदेश की सत्ता संभालते ही मुख्यमंत्री मायावती ने कड़े निर्देश दिए। इसके बाद स्पेशल टास्क फोर्स (STF) के आईजी/एसएसपी अमिताभ यश और एएसपी अनंत देव के नेतृत्व में 'ऑपरेशन ददुआ' का जाल बिछाया गया।

15 अप्रैल 2007 को एसटीएफ ने चंबल की तरफ कूच किया। लंबी तलाश और पुख्ता सर्विलांस इनपुट के बाद 22 जुलाई को सुबह 3 बजे सूचना मिली कि ददुआ चित्रकूट के मानिकपुर क्षेत्र के आल्हा-झलमल के जंगलों में छिपा हुआ है। एसटीएफ की टीम ने बिना एक पल की नींद लिए, जंगल के भीतर छिपते-छिपाते 10 से 50 किलोमीटर तक का खतरनाक सफर तय किया। चारों तरफ मौत की आहट के बीच सुबह 9:15 बजे टीम ने पोजीशन ली और ददुआ के गैंग पर धावा बोल दिया। एक घंटे से ज्यादा चली भीषण गोलीबारी के बाद आखिरकार एसटीएफ ने 5.5 लाख के इनामी, 'बुंदेलखंड के वीरप्पन' कहे जाने वाले दस्यु सरगना शिवकुमार पटेल उर्फ ददुआ को उसके 5 साथियों के साथ ढेर कर दिया। इस प्रकार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के जंगलों में तीन दशकों तक आतंक और राजनीति का खेल खेलने वाले 'गुनाहों के देवता' के साम्राज्य का अंत हो गया।

Location :  Lucknow

Published :  8 September 2026, 12:43 PM IST