खून का नहीं, भरोसे का रिश्ता… माँ-बाप के जाने के बाद मुस्लिम भाई ने धूमधाम से रचाई हिंदू बहन की शादी

यूपी के बदायूं में इंसानियत की अनूठी मिसाल सामने आई है। माता-पिता के निधन के बाद मुस्लिम भाई ने सगे भाई का फर्ज निभाते हुए अपनी हिंदू बहन का धूमधाम से कन्यादान किया और शादी का पूरा खर्च उठाया। इस शादी ने समाज को आपसी प्रेम का बड़ा संदेश दिया है।

Post Published By: Suresh Prajapati
Updated : 10 July 2026, 11:26 AM IST

Budaun: आज के दौर में जहाँ अक्सर धर्म और दीवारों की बातें सुर्खियाँ बनती हैं, वहीं उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले से सांप्रदायिक सौहार्द और इंसानियत की एक ऐसी बेमिसाल कहानी सामने आई है, जिसने हर किसी का दिल जीत लिया। यहाँ एक मुस्लिम भाई ने अपनी हिंदू बहन के सिर से माता-पिता का साया उठ जाने के बाद न केवल उसकी शादी की पूरी ज़िम्मेदारी उठाई, बल्कि हिंदू रीति-रिवाज से उसका कन्यादान भी किया है।

मां-बाप नहीं रहे, तो भाई बनकर संभाली पूरी जिम्मेदारी

इस पूरी कहानी के केंद्र में है वह अटूट भरोसा और जिम्मेदारी, जिसने खून के रिश्तों को भी पीछे छोड़ दिया। दुल्हन दीपांशी के माता-पिता का पहले ही निधन हो चुका था। माता-पिता के चले जाने के बाद दीपांशी खुद को बिल्कुल अकेला महसूस कर रही थी, लेकिन ऐसे समय में उसके मुंहबोले मुस्लिम भाई रियासत उर्फ बबलू सिद्दीकी देवदूत बनकर सामने आए। बरसों पहले दीपांशी को अपनी बहन मानने वाले बबलू सिद्दीकी ने इस संकट की घड़ी में एक सच्चे सगे भाई का फर्ज़ निभाया। उन्होंने ठान लिया था कि वे अपनी बहन को माता-पिता की कमी का अहसास नहीं होने देंगे और उन्होंने शादी की शुरुआत से लेकर विदाई तक की हर छोटी-बड़ी जिम्मेदारी पूरी शिद्दत के साथ अपने कंधों पर उठा ली।

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उझानी कस्बे में धूमधाम से आई बारात, हिंदू रीति-रिवाज से हुआ विवाह

यह अनोखा और ऐतिहासिक विवाह बदायूं जिले के उझानी कस्बे में स्थित 'एसएस ग्रीन पैलेस' में संपन्न हुआ। बुधवार, 8 जुलाई की रात को दीपांशी के जीवन में खुशियों की बारात आई, जब दूल्हे कमलकांत ने अपनी दुल्हनिया का हाथ थामा। यह शादी पूरी तरह से पारंपरिक हिंदू रीति-रिवाजों और वैदिक मंत्रोचार के बीच संपन्न हुई। इस विवाह की सबसे भावुक और मुख्य रस्म यानी 'कन्यादान' को खुद भाई बबलू सिद्दीकी ने पूरा किया। जब एक मुस्लिम भाई ने मंडप में बैठकर अपनी हिंदू बहन का कन्यादान किया, तो वहाँ मौजूद हर शख्स की आँखें नम हो गईं और हर दिल इस अटूट रिश्ते को देखकर गद्गद हो उठा।

800 मेहमानों का स्वागत और शादी का पूरा खर्च

एक सगे भाई की तरह बबलू सिद्दीकी और उनके पूरे परिवार ने इस शादी को भव्य बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। शादी के पूरे आयोजन का खर्च उठाने के साथ-साथ तैयारियों की हर बारीकी का ध्यान बबलू ने खुद रखा। बारात के शानदार स्वागत से लेकर मेहमानों की खातिरदारी तक, सब कुछ अत्यंत व्यवस्थित था। समारोह में लगभग 800 मेहमान शामिल हुए थे, जिनके लिए भोजन और ठहरने की उत्तम व्यवस्था बबलू सिद्दीकी के परिवार द्वारा की गई थी।

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विदाई की भावुक घड़ी: हार गई नफरत, जीत गई इंसानियत

जब शादी की रस्में पूरी हुईं और दीपांशी की विदाई का वक्त आया, तो माहौल बेहद भावुक हो गया। बबलू और उनके परिजनों ने दीपांशी को विदा करते समय वही लाड-प्यार और आशीर्वाद दिया जो एक माता-पिता अपनी बेटी को देते हैं। विदाई के इस दृश्य ने साबित कर दिया कि समाज में नफरत चाहे जितनी कोशिश कर ले, लेकिन आखिर में जीत हमेशा इंसानियत और मोहब्बत की ही होती है। खुद दीपांशी ने भी भावुक होते हुए कहा कि बबलू ने उसके लिए जो किया, वह एक सगे भाई से भी बढ़कर है।

समाज के लिए मिसाल बनी उझानी की यह अनोखी शादी

आज जब धर्म और पहचान के नाम पर समाज को बांटने की कोशिशें होती हैं, तब बदायूं की यह शादी देश के लिए एक नई राह दिखाती है। उझानी की इस धरती से निकला यह संदेश पूरे देश को यह याद दिलाता है कि रिश्तों की सबसे मजबूत डोर इंसानियत और आपसी विश्वास से बनती है, धर्म से नहीं। प्रेम, विश्वास और अपनापन दुनिया की हर दीवार से कहीं ऊंचे और बड़े होते हैं।

Location :  Budaun

Published :  10 July 2026, 11:26 AM IST