कड़कती धूप में लालटेन-चटाई लेकर कब्रिस्तान क्यों पहुंचे थे मौलाना? गांधी जी से जुड़ी है बलरामपुर की कहानी

बलरामपुर के मौलाना अहमद जमा खां ने स्वतंत्रता आंदोलन में अपना करियर और रियासत की हकीमी छोड़कर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष किया। 1920 में असहयोग आंदोलन से जुड़े, 1929 में गांधी जी को बलरामपुर लाए और 1930 के नमक सत्याग्रह में गिरफ्तार हुए। उनका साहस आज भी इतिहास में याद किया जाता है।

Post Published By: Poonam Rajput
Updated : 14 August 2026, 4:19 PM IST

Balmrakhpur: बलरामपुर की धरती ने स्वतंत्रता आंदोलन में कई ऐसे वीरों को जन्म दिया, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना सुख-चैन और सम्मान तक दांव पर लगा दिया। इन्हीं में बलुहा मोहल्ले के रहने वाले मौलाना अहमद जमा खां का नाम भी शामिल है।

मौलाना अहमद जमा खां उस दौर में रियासत में हकीम के रूप में सम्मानित थे। उनके पास प्रतिष्ठा और सुरक्षित जीवन था, लेकिन देश में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बढ़ते आंदोलन ने उनके भीतर भी बदलाव की लौ जगा दी। उन्होंने अपना रुतबा और करियर छोड़कर स्वतंत्रता संग्राम की राह पकड़ ली।

1920 में असहयोग आंदोलन से जुड़े

साल 1920 में महात्मा गांधी के आह्वान पर देशभर में असहयोग आंदोलन की शुरुआत हुई। गोंडा और बलरामपुर क्षेत्र में आंदोलन की अलख जगाने वालों में मौलाना अहमद जमा खां प्रमुख रूप से आगे आए।

उन्होंने रियासत की हकीमी छोड़कर लगान विरोधी आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। उनका उद्देश्य लोगों को अंग्रेजी शासन के खिलाफ एकजुट करना और स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ना था।

जब गांधी जी को बलरामपुर लाने की ठानी

मौलाना अहमद जमा खां का गांधी जी के प्रति गहरा सम्मान था। वर्ष 1929 में जब गांधी जी मनकापुर पहुंचे, तो मौलाना उन्हें बलरामपुर लाने की जिद पर अड़ गए।

गांधी जी के स्वागत और आंदोलन के लिए आर्थिक संसाधन जुटाना बड़ी चुनौती थी। स्थानीय स्तर पर जब अपेक्षित सहयोग नहीं मिला तो मौलाना ने लोगों को झकझोर देने वाला तरीका अपनाया।

लालटेन और चटाई लेकर कब्रिस्तान पहुंचे

बताया जाता है कि मौलाना अहमद जमा खां कड़ी धूप में हाथ में लालटेन और चटाई लेकर कब्रिस्तान की ओर चल पड़े। लोगों ने जब उन्हें रोककर ऐसा करने की वजह पूछी तो उन्होंने शहरवासियों की निष्क्रियता पर तीखा तंज कसा।

विभाजन की त्रासदी को भूलना नहीं… सदर विधायक बोले- इतिहास से सीखकर राष्ट्र की एकता को और मजबूत करें

उन्होंने कहा कि शहर के लोग जमीर से मर चुके हैं, इसलिए अब वह कब्रों में सोए मुर्दों को जगाकर गांधी जी का स्वागत करेंगे। उनके इस अंदाज ने लोगों को अंदर तक झकझोर दिया। इसके बाद आंदोलन के लिए आर्थिक सहयोग जुटाने में तेजी आई और लोगों ने बढ़-चढ़कर चंदा देना शुरू किया।

नमक सत्याग्रह में हुई पहली गिरफ्तारी

स्वतंत्रता आंदोलन में मौलाना अहमद जमा खां की सक्रियता यहीं नहीं रुकी। वर्ष 1930 में जब नमक सत्याग्रह ने देशभर में अंग्रेजी शासन के खिलाफ माहौल बनाया, तब बलरामपुर से पहली गिरफ्तारी मौलाना की हुई। उन्हें छह महीने की सश्रम कारावास की सजा भुगतनी पड़ी। जेल की कठिनाइयों के बावजूद उनके हौसले में कमी नहीं आई।

महराजगंज में नशीले इंजेक्शन की बड़ी खेप, नेपाल भेजने से पहले पुलिस ने दबोचे 3 तस्कर; 4350 इंजेक्शन बरामद

इतिहास में दर्ज है उनका संघर्ष

मौलाना अहमद जमा खां का जीवन बताता है कि स्वतंत्रता आंदोलन सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित नहीं था। छोटे कस्बों और रियासतों में भी ऐसे लोगों ने आंदोलन को मजबूती दी, जिन्होंने अपना निजी जीवन छोड़कर देश को प्राथमिकता दी।

आज आजादी के जश्न के बीच बलरामपुर के इस स्वतंत्रता सेनानी को याद करना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि उनका योगदान इतिहास के उन पन्नों में दर्ज है, जिन्हें नई पीढ़ी तक पहुंचाने की जरूरत है। उनका साहस, त्याग और बेबाक अंदाज आज भी बलरामपुर की मिट्टी से जुड़ी स्वतंत्रता संघर्ष की विरासत का हिस्सा है।

Location :  Balrampur

Published :  14 August 2026, 4:19 PM IST