Allahabad Highcourt: पैसे के लेनदेन का विवाद क्या ‘धोखाधड़ी’ है? इलाहाबाद हाईकोर्ट की इस टिप्पणी से बिजनेस जगत को मिली बड़ी राहत

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चीनी कंपनी के मालिक के खिलाफ दर्ज चार्जशीट रद्द करते हुए बड़ी टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि बिजनेस एग्रीमेंट और भुगतान के विवाद सिविल मामले हैं, इनके लिए क्रिमिनल कोर्ट का शॉर्टकट गलत है।

Post Published By: Suresh Prajapati
Updated : 17 May 2026, 7:15 PM IST

Allahabad: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दीवानी (सिविल) और आपराधिक (क्रिमिनल) मामलों के अंतर को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और नजीर बनने वाली टिप्पणी की है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल 'धोखाधड़ी' या 'छल' जैसे भारी-भरकम शब्दों का इस्तेमाल कर देने मात्र से ही कोई विशुद्ध सिविल या व्यावसायिक विवाद आपराधिक मामला नहीं बन जाता। अदालत ने कहा कि बिजनेस एग्रीमेंट में भुगतान के विवाद पूरी तरह से सिविल कोर्ट के दायरे में आते हैं और इनके लिए पुलिस या आपराधिक अदालतों का 'शॉर्टकट' रास्ता अपनाना कानून की प्रक्रिया का सरासर दुरुपयोग है।

चीनी कंपनी के मालिक के खिलाफ चार्जशीट और आपराधिक कार्यवाही रद्द

इस अहम टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति समित गोपाल की एकल पीठ ने चीन की एक कंपनी के मालिक हे हाओमिन के खिलाफ गौतमबुद्ध नगर (नोएडा) में चल रही पूरी आपराधिक कार्यवाही और पुलिस द्वारा दाखिल की गई चार्जशीट को पूरी तरह रद्द कर दिया है।

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यह पूरा मामला गौतमबुद्ध नगर के दादरी थाना क्षेत्र का है, जो दो कंपनियों के बीच एक प्लांट स्थापना के अनुबंध से जुड़ा हुआ था। शिकायतकर्ता कंपनी ने आरोप लगाया था कि कुल 1.40 करोड़ रुपये के काम में से चीनी कंपनी ने केवल 42 लाख रुपये का आंशिक भुगतान किया और बाकी बचे 98 लाख रुपये दबा लिए जो कि धोखाधड़ी है।

आंशिक भुगतान हुआ, तो शुरुआत से धोखा देने की मंशा नहीं: हाईकोर्ट

मामले की गहन सुनवाई के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पाया कि आरोपी कंपनी द्वारा 42 लाख रुपये का आंशिक भुगतान किया गया था। कोर्ट ने कानूनी सिद्धांत को स्पष्ट करते हुए कहा कि चूंकि आंशिक भुगतान किया गया था, इसलिए यह कतई साबित नहीं होता कि आरोपी की मंशा शुरुआत से ही धोखा देने की थी।

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अदालत ने साफ किया कि काम पूरा होने के बाद महज बकाया भुगतान न करना या उसमें देरी होना 'अनुबंध का उल्लंघन' यानी सिविल विवाद माना जाएगा, न कि आईपीसी/बीएनएस के तहत धोखाधड़ी। शिकायतकर्ता अपने बकाया 98 लाख रुपये की वसूली के लिए दीवानी अदालत या मध्यस्थता का कानूनी रास्ता चुन सकता है।

'मजिस्ट्रेट मूकदर्शक बनकर समन जारी न करें, विवेक का इस्तेमाल करें'

हाईकोर्ट ने इस मामले में निचली अदालतों (टायल कोर्ट) की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर रुख अपनाया और उन्हें नसीहत दी। अदालत ने कहा कि जब भी कोई सिविल प्रकृति का मामला आपराधिक रंग देकर मजिस्ट्रेट के सामने लाया जाए, तो मजिस्ट्रेट को मूकदर्शक बनकर आंखें मूंदकर समन जारी नहीं कर देना चाहिए। मजिस्ट्रेट को समन जारी करने से पहले अपने न्यायिक विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए और यह देखना चाहिए कि क्या वाकई कोई आपराधिक मामला बनता है या यह सिर्फ दीवानी विवाद है।

Location :  Allahabad

Published :  17 May 2026, 7:15 PM IST