
शिवभक्त दीपांशु (IMG: Dynamite News)
Muzaffarnagar: मुज़फ्फरनगर में सावन की कांवड़ यात्रा के बीच एक ऐसी अनोखी कांवड़ ने हर किसी के कदम रोक दिए, जिसे देखकर लोग हैरान भी हुए और श्रद्धा से सिर भी झुका दिया। 10, 20, 50 और 100 रुपये के अनगिनत नोटों से सजी यह कांवड़ दूर से ही लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच रही है। हर कोई जानना चाहता है कि आखिर इस कांवड़ के पीछे की कहानी क्या है। जब शिवभक्त ने इसका मकसद बताया तो लोगों ने उनकी आस्था की जमकर सराहना की।
सावन के पवित्र महीने में लाखों शिवभक्त हरिद्वार से गंगाजल लेकर अपने-अपने गंतव्य की ओर बढ़ रहे हैं। इस दौरान अलग-अलग तरह की भव्य और आकर्षक कांवड़ें भी देखने को मिल रही हैं। इन्हीं के बीच दिल्ली-एनसीआर के रहने वाले शिवभक्त दीपांशु की 'नोटों वाली कांवड़' लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है।
दीपांशु ने बताया कि उन्होंने 28 जुलाई को हरिद्वार की हर की पौड़ी से पवित्र गंगाजल भरा और वहीं से अपनी पैदल यात्रा शुरू की। उनकी मंजिल अपने क्षेत्र में पहुंचकर भगवान शिव का जलाभिषेक करना है। उन्होंने बताया कि अब तक करीब 200 किलोमीटर की यात्रा पूरी कर चुके हैं। रोजाना लगभग 18 से 19 किलोमीटर पैदल चलते हैं ताकि पूरी श्रद्धा और नियमों के साथ अपनी यात्रा संपन्न कर सकें। उनका लक्ष्य 10 अगस्त तक अपनी यात्रा पूरी करने का है।
दीपांशु की कांवड़ का सबसे खास पहलू इसकी सजावट है। कांवड़ का बेस स्ट्रक्चर उन्होंने हर की पौड़ी से खरीदा, जबकि ऊपर की पूरी सजावट 10, 20, 50 और 100 रुपये के नोटों से की गई है। जब उनसे पूछा गया कि इस कांवड़ पर कितने रुपये लगे हैं तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि उन्होंने कभी इसकी गिनती नहीं की। उनके लिए नोटों की कीमत से ज्यादा भगवान भोलेनाथ के प्रति श्रद्धा और समर्पण मायने रखता है। यही वजह है कि उन्होंने इस अनोखे तरीके से अपनी भक्ति को व्यक्त करने का फैसला किया।
इस अनोखी कांवड़ के पीछे सिर्फ आकर्षण नहीं, बल्कि सेवा का भाव भी जुड़ा हुआ है। दीपांशु ने बताया कि जलाभिषेक पूरा होने के बाद कांवड़ पर लगाए गए सभी नोट उतारे जाएंगे और उसी धनराशि से भंडारे का आयोजन किया जाएगा। उनका कहना है कि बाबा भोलेनाथ की कृपा से मिली इस श्रद्धा का लाभ ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचे, इसलिए उन्होंने भंडारे का संकल्प लिया है। यही उनकी कांवड़ यात्रा का सबसे बड़ा उद्देश्य भी है।
मुज़फ्फरनगर में छा गई नोटों वाली कांवड़, हर कोई जानना चाहता था आखिर क्या है इसकी कहानी
दीपांशु पूरी यात्रा के दौरान अकेले अपने कंधे पर यह कांवड़ लेकर चल रहे हैं। हालांकि उनके तीन भाई हर कदम पर उनका सहयोग कर रहे हैं। यात्रा के दौरान भोजन, विश्राम और अन्य व्यवस्थाओं में उनके भाई लगातार साथ बने हुए हैं, ताकि यात्रा बिना किसी परेशानी के पूरी हो सके। दीपांशु का कहना है कि कांवड़ यात्रा सिर्फ शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक तपस्या भी है। इसलिए पूरी श्रद्धा और अनुशासन के साथ यात्रा करना ही सबसे बड़ी भक्ति है।
यात्रा के दौरान उत्तर प्रदेश में मिले सहयोग से भी दीपांशु काफी प्रभावित नजर आए। उन्होंने बताया कि यूपी में प्रवेश करने के बाद जगह-जगह शिवभक्तों के लिए बेहतर व्यवस्थाएं की गई हैं। रास्ते में भोजन, पानी, चिकित्सा और विश्राम जैसी सुविधाएं आसानी से मिल रही हैं। उन्होंने कहा कि स्थानीय लोगों और स्वयंसेवकों ने भी उनका गर्मजोशी से स्वागत किया। यही वजह है कि पूरी यात्रा बेहद सहज और उत्साहपूर्ण माहौल में आगे बढ़ रही है।
Location : Muzaffarnagar
Published : 3 August 2026, 12:49 PM IST