
अमेरिका बनाम वेनेजुएला
New Delhi: इस समय पूरी दुनिया में एक ऐसा मुद्दा उठ खड़ा हुआ है जिसने न केवल लैटिन अमेरिका बल्कि पूरी दुनिया की राजनीति, अंतरराष्ट्रीय कानून और वैश्विक शक्ति संतुलन को झकझोर कर रख दिया है। यह सिर्फ एक खबर नहीं है, यह एक ऐसी घटना है जिसने देशों को वैचारिक रूप से बांट दिया है, कूटनीति को असहज कर दिया है और यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या आज की दुनिया में ताकत कानून से बड़ी हो चुकी है।
वरिष्ठ पत्रकार मनोज टिबड़ेवाल आकाश ने अपने चर्चित शो The MTA Speaks में वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को अमेरिकी सेना द्वारा हिरासत में लिए जाने को लेकर सटीक विश्लेषण किया।
सबसे पहले बात करते हैं निकोलस मादुरो की, क्योंकि किसी भी घटना को समझने के लिए उसके केंद्र में मौजूद व्यक्ति को समझना जरूरी होता है। निकोलस मादुरो का राजनीतिक सफर किसी अभिजात वर्ग के नेता जैसा नहीं रहा। उनका जन्म वेनेजुएला की राजधानी कराकस में एक साधारण वामपंथी परिवार में हुआ। उनके पिता खुद एक ट्रेड यूनियन नेता थे और मजदूर आंदोलनों से जुड़े रहे।
मादुरो ने अपनी युवावस्था में मेट्रो बस ड्राइवर के रूप में काम किया और वहीं से वेनेजुएला के श्रमिक आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई। वे ट्रांसपोर्ट यूनियन के सदस्य बने और धीरे-धीरे यूनियन राजनीति से राष्ट्रीय राजनीति की ओर बढ़े। बताया जाता है कि मादुरो भारत से भी भावनात्मक रूप से जुड़े रहे हैं और खुद को सत्य साईं बाबा का अनुयायी बताते रहे हैं। यह तथ्य अंतरराष्ट्रीय मीडिया में कई बार उल्लेखित हो चुका है और मादुरो की छवि को एक अलग आयाम देता है।
1992 का साल वेनेजुएला की राजनीति में एक निर्णायक मोड़ था। राष्ट्रपति कार्लोस एंड्रेस पेरेज के खिलाफ जब सत्ता-विरोधी आंदोलन तेज हुआ और ह्यूगो शावेज को जेल से रिहा कराने की मांग उठी, तब निकोलस मादुरो इस आंदोलन के अग्रणी चेहरों में शामिल थे। यहीं से उनका राजनीतिक उदय शुरू होता है। 1999 में वे संविधान सभा के सदस्य चुने गए और नए वेनेजुएला संविधान के निर्माण में अहम भूमिका निभाई। 2000 में वे पहली बार नेशनल असेंबली के सदस्य बने।
ह्यूगो शावेज के सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में मादुरो शामिल थे। 2006 से 2013 तक वे वेनेजुएला के विदेश मंत्री रहे और इस दौरान उन्होंने अमेरिका-विरोधी तथा बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की नीति को मुखर रूप से आगे बढ़ाया। 2012 में उन्हें उपराष्ट्रपति बनाया गया और जब ह्यूगो शावेज कैंसर से जूझ रहे थे, तब उन्होंने सार्वजनिक रूप से निकोलस मादुरो को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। मार्च 2013 में शावेज के निधन के बाद मादुरो अंतरिम राष्ट्रपति बने और फिर चुनाव जीतकर पूर्ण राष्ट्रपति बने।
मादुरो का शासनकाल शुरू से ही विवादों में रहा। उनके कार्यकाल में वेनेजुएला को भीषण आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा। दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडारों में से एक होने के बावजूद देश में महंगाई चरम पर पहुंच गई, मुद्रा का अवमूल्यन हुआ, खाद्य और दवाइयों की भारी कमी देखी गई और लाखों लोग देश छोड़कर पलायन करने को मजबूर हुए। विपक्ष ने मादुरो पर सत्ता के केंद्रीकरण, चुनावी प्रक्रिया को कमजोर करने, मीडिया पर नियंत्रण और मानवाधिकार उल्लंघन के गंभीर आरोप लगाए।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मादुरो का नेतृत्व विभाजनकारी रहा। अमेरिका और यूरोपीय देशों ने उन्हें अवैध राष्ट्रपति करार दिया, जबकि रूस, चीन, क्यूबा और ईरान जैसे देशों ने उनकी सरकार को वैध समर्थन दिया।
अब आते हैं उस घटनाक्रम पर जिसने दुनिया को चौंका दिया। अमेरिका का दावा है कि 2026 की शुरुआत में उसने निकोलस मादुरो के खिलाफ एक व्यापक सैन्य और कानूनी अभियान चलाया। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि मादुरो पर दशकों से अंतरराष्ट्रीय ड्रग तस्करी नेटवर्क के साथ मिलीभगत, हिंसक गिरोहों को संरक्षण और अमेरिका तक मादक पदार्थों की आपूर्ति में भूमिका निभाने के ठोस सबूत मौजूद हैं। इन्हीं आरोपों के आधार पर अमेरिका में उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाने की तैयारी की गई।
अमेरिकी सेना ने दावा किया कि विशेष सैन्य ऑपरेशन के तहत मादुरो और उनकी पत्नी को हिरासत में लिया गया और उन्हें अमेरिका लाया गया। इस पूरे ऑपरेशन को कथित तौर पर फ्लोरिडा के मार-ए-लागो क्लब से मॉनिटर किया जा रहा था, जहां डोनाल्ड ट्रंप मौजूद थे और लाइव घटनाक्रम देख रहे थे।
अमेरिका का कहना है कि यह कार्रवाई कानून के दायरे में अपराधियों को न्याय के कटघरे में लाने के लिए जरूरी थी और इसका उद्देश्य वेनेजुएला में फैले ड्रग नेटवर्क को तोड़ना था। लेकिन यहीं से अंतरराष्ट्रीय विवाद शुरू होता है।
अंतरराष्ट्रीय कानून के विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं कि क्या किसी संप्रभु देश के मौजूदा राष्ट्रपति को बिना संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अनुमति के सैन्य बल का प्रयोग कर हिरासत में लिया जा सकता है। कई विशेषज्ञ इसे अंतरराष्ट्रीय कानून, संयुक्त राष्ट्र चार्टर और संप्रभुता के सिद्धांतों का उल्लंघन मानते हैं। उनका कहना है कि आपराधिक आरोपों की जांच और अभियोजन के लिए अंतरराष्ट्रीय न्यायालय या कूटनीतिक प्रक्रिया मौजूद है, न कि सैन्य हस्तक्षेप।
अमेरिका यह जरूर कहता है कि उसके पास पुख्ता सबूत हैं, लेकिन जब तक अंतरराष्ट्रीय न्यायिक मंच पर दोष सिद्ध नहीं होता, तब तक यह कार्रवाई कानूनन और नैतिक रूप से सवालों के घेरे में रहती है।
यह सिर्फ गिरफ्तारी नहीं बल्कि शक्ति प्रदर्शन भी माना जा रहा है। एक स्वतंत्र देश के राष्ट्रपति को सैन्य अभियान के तहत पकड़कर न्यूयॉर्क लाया जाना आधुनिक इतिहास में लगभग अभूतपूर्व है। इससे पहले ऐसे उदाहरण बेहद सीमित रहे हैं और वो भी अंतरराष्ट्रीय सहमति के साथ।
दुनिया भर से प्रतिक्रियाएं तेज़ी से सामने आईं। रूस ने इसे वेनेजुएला की संप्रभुता पर सीधा हमला बताया। स्पेन और कई यूरोपीय देशों ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र की मंजूरी के बिना ऐसा कदम अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को कमजोर करता है। लैटिन अमेरिका के कई देशों में इस घटना के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हुए। वहीं वेनेजुएला के भीतर समाज दो हिस्सों में बंटा दिखा, कुछ लोग इसे तानाशाही के अंत के रूप में देख रहे हैं, तो कुछ इसे विदेशी हस्तक्षेप और नव-उपनिवेशवाद मान रहे हैं।
भारत ने संतुलित रुख अपनाते हुए दोनों देशों से संयम और बातचीत के जरिए समाधान निकालने की अपील की है।
इस पूरे घटनाक्रम ने कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या कोई देश सिर्फ आरोपों के आधार पर दूसरे देश के राष्ट्रपति को पकड़ सकता है। क्या ताकतवर होना ही अब न्याय का नया पैमाना बन चुका है। क्या यह कार्रवाई भविष्य में कमजोर देशों के लिए एक खतरनाक उदाहरण बनेगी।
आर्थिक प्रभाव भी सामने आने लगे हैं। वेनेजुएला तेल उत्पादक देश है और इस अस्थिरता का असर वैश्विक तेल बाजारों पर देखा जा रहा है। कीमतों में उतार-चढ़ाव इस बात का संकेत है कि इसका प्रभाव दूरगामी हो सकता है।
आने वाले समय में इसके राजनीतिक परिणाम और गहरे होंगे। लैटिन अमेरिका में गठजोड़ बदल सकते हैं। अमेरिका-चीन-रूस संबंधों में नई तल्खी आ सकती है। संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय कानून की भूमिका पर फिर से बहस तेज होगी।
निकोलस मादुरो की हिरासत सिर्फ एक व्यक्ति का मामला नहीं है। यह वैश्विक राजनीति की दिशा, शक्ति और कानून के रिश्ते और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की परीक्षा है। अमेरिका इसे ड्रग और अपराध के खिलाफ कार्रवाई कह रहा है, जबकि दुनिया का एक बड़ा हिस्सा इसे संप्रभुता पर हमला मान रहा है। इसका असर आने वाले महीनों और वर्षों तक राजनीति, अर्थव्यवस्था, सुरक्षा नीति और वैश्विक संतुलन पर महसूस किया जाएगा।
Location : New Delhi
Published : 6 January 2026, 9:44 AM IST