
शादीशुदा के साथ लिव-इन अपराध नहीं, कोर्ट के आदेश का पूरा विश्लेषण (Img: Dynamite News)
New Delhi: आज हम बात कर रहे हैं इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक ऐसे फैसले की जिसने कानून, समाज और नैतिकता- तीनों के बीच एक नई बहस को जन्म दे दिया है। यह मामला उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जनपद से जुड़ा है, जहां एक बालिग लड़की अपनी मर्जी से एक शादीशुदा पुरुष के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रह रही थी। दोनों वयस्क थे, अपने फैसले लेने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र थे, लेकिन इस रिश्ते को लेकर लड़की के परिवार ने कड़ा विरोध जताया।
वरिष्ठ पत्रकार मनोज टिबड़ेवाल आकाश ने अपने चर्चित शो The MTA Speaks में, एक बालिग लड़की के अपनी मर्जी से एक शादीशुदा पुरुष के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रहने के मामले पर कोर्ट के फैसले को लेकर विश्लेषण किया।
दरअसल, परिजनों ने इसे सामाजिक मर्यादाओं के खिलाफ बताते हुए पुलिस में शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद इस जोड़े के खिलाफ संभावित कानूनी कार्रवाई का खतरा पैदा हो गया और उनके लिए हालात असहज होते चले गए। जब स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि उन्हें अपनी सुरक्षा पर खतरा महसूस होने लगा तो इस जोड़े ने न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाया और हाईकोर्ट में याचिका दायर कर स्पष्ट कहा कि वे दोनों अपनी इच्छा से साथ रह रहे हैं, उनके रिश्ते में किसी तरह का दबाव, धोखाधड़ी या जबरदस्ती शामिल नहीं है, इसलिए उन्हें पुलिस कार्रवाई से संरक्षण दिया जाए और उनके मौलिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित की जाए।
इस मामले की सुनवाई हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने की, जिसमें जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना शामिल थे। सुनवाई के दौरान अदालत ने सबसे पहले जिस मूल सिद्धांत को केंद्र में रखा, वह था व्यक्तिगत स्वतंत्रता, जो भारतीय संविधान का एक अहम स्तंभ है। अदालत ने अपने अवलोकन में साफ कहा कि अनुच्छेद 21 हर नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। इस अधिकार के तहत यह भी शामिल है कि कोई व्यक्ति किसके साथ रहना चाहता है और किस तरह का निजी जीवन जीना चाहता है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जब दो बालिग व्यक्ति अपनी सहमति से साथ रह रहे हों तो उसमें राज्य या समाज को अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, जब तक कि किसी प्रकार का आपराधिक तत्व मौजूद न हो। इस दौरान अदालत ने पुलिस प्रशासन की भूमिका और जिम्मेदारी पर भी कड़ी टिप्पणी की और शाहजहांपुर के पुलिस अधीक्षक को व्यक्तिगत रूप से निर्देश दिया कि वे इस जोड़े की सुरक्षा सुनिश्चित करें और किसी भी प्रकार की उत्पीड़न की स्थिति को रोका जाए।
कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी याद दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही 2018 के ‘शक्ति वाहिनी’ मामले में यह स्पष्ट कर चुका है कि दो बालिग व्यक्तियों को अपनी पसंद से साथ रहने का पूरा अधिकार है और ऐसे मामलों में पुलिस का दायित्व है कि वह उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करे, न कि सामाजिक दबाव के आधार पर उन्हें परेशान करे।
इसी के साथ अदालत ने रजिस्ट्रार (अनुपालन) को निर्देश दिया कि इस आदेश की सूचना 24 घंटे के भीतर संबंधित पुलिस अधिकारियों तक पहुंचाई जाए, जिससे आदेश का तत्काल प्रभाव से पालन सुनिश्चित हो सके। अदालत ने अगली सुनवाई की तारीख भी निर्धारित की और तब तक के लिए याचिकाकर्ता जोड़े की गिरफ्तारी पर रोक लगाते हुए उन्हें सुरक्षा प्रदान करने का स्पष्ट आदेश दिया।
इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि अदालत ने एक बेहद स्पष्ट और सशक्त संदेश दिया- अगर कोई शादीशुदा पुरुष किसी बालिग महिला के साथ उसकी सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में रहता है तो यह अपने आप में कोई अपराध नहीं है। कोर्ट ने कहा कि कानून और नैतिकता दो अलग-अलग क्षेत्र हैं और समाज भले ही किसी रिश्ते को सही या गलत मानता हो, लेकिन जब तक कोई कानून का उल्लंघन नहीं हुआ है। तब तक उस आधार पर किसी को अपराधी नहीं ठहराया जा सकता।
यह टिप्पणी भारतीय न्याय व्यवस्था के उस सिद्धांत को मजबूत करती है, जिसमें व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सर्वोपरि माना गया है। दरअसल, भारत में लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर न्यायपालिका का रुख समय के साथ काफी स्पष्ट होता गया है। कई मामलों में सुप्रीम कोर्ट यह कह चुका है कि दो वयस्कों का साथ रहना अपराध नहीं है, भले ही वह रिश्ता विवाह के पारंपरिक ढांचे में न हो।
हालांकि, इस केस में एक अतिरिक्त जटिलता यह थी कि पुरुष पहले से शादीशुदा था, जिससे यह मामला सामाजिक दृष्टि से और अधिक संवेदनशील हो गया। इसके बावजूद अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया कि केवल वैवाहिक स्थिति के आधार पर किसी लिव-इन रिलेशनशिप को अपराध नहीं ठहराया जा सकता, जब तक उसमें किसी प्रकार की आपराधिक मंशा या कृत्य शामिल न हो।
यह बात भी महत्वपूर्ण है कि भारतीय दंड संहिता में वयस्कों के बीच सहमति से बने ऐसे संबंधों को सीधे तौर पर अपराध की श्रेणी में नहीं रखा गया है, हालांकि वैवाहिक विवादों के संदर्भ में अलग-अलग कानूनी पहलू सामने आ सकते हैं। इस फैसले के बाद समाज में तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। एक वर्ग इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता की जीत के रूप में देख रहा है और यह मानता है कि राज्य को किसी के निजी जीवन में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं होना चाहिए। वहीं, दूसरा वर्ग इसे पारंपरिक पारिवारिक मूल्यों के खिलाफ मानते हुए चिंता जता रहा है और उनका कहना है कि इस तरह के फैसले सामाजिक ढांचे और नैतिक मानकों को कमजोर कर सकते हैं।
यही वह बिंदु है जहां यह मामला एक बड़े वैचारिक संघर्ष का रूप ले लेता है- एक तरफ आधुनिकता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की मांग है, तो दूसरी तरफ परंपराओं और सामाजिक संरचना को बनाए रखने की चिंता। असल में, यह पूरा प्रकरण एक बुनियादी सवाल को सामने लाता है- क्या कानून को समाज की नैतिकता के अनुसार चलना चाहिए या कानून का काम केवल नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना है? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह स्पष्ट संकेत दिया है कि कानून का प्राथमिक उद्देश्य नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करना है, न कि सामाजिक नैतिकता को लागू करना।
यह निर्णय उस बदलते भारत की झलक भी देता है, जहां युवा पीढ़ी अपने व्यक्तिगत विकल्पों को लेकर अधिक मुखर हो रही है और न्यायपालिका उन विकल्पों की संवैधानिक सुरक्षा को सुनिश्चित करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि लोकतंत्र में न्यायपालिका की भूमिका केवल विवादों का निपटारा करना नहीं, बल्कि समाज को दिशा देना भी है। अ
ब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आने वाले समय में इस तरह के मामलों में निचली अदालतें और अन्य उच्च न्यायालय किस तरह का रुख अपनाते हैं और समाज इस बदलते कानूनी दृष्टिकोण को किस हद तक स्वीकार करता है। फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि यह फैसला एक मिसाल बनकर सामने आया है, जिसने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों को केंद्र में रखते हुए एक नई बहस को जन्म दिया है और आने वाले समय में यह बहस और गहरी होने की पूरी संभावना है।
Location : New Delhi
Published : 29 March 2026, 8:22 PM IST