वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर होली से पहले मनाए जाने वाले ‘मसान की होली’ आयोजन को लेकर काशी विद्वत परिषद ने आपत्ति जताई है। विद्वानों ने कहा कि यह सनातन धर्म का मजाक है और इससे समाज में विकृति फैल सकती है।

मसान की होली (फोटो सोर्स- इंटरनेट)
Varanasi: काशी के मणिकर्णिका घाट पर होली के ठीक पहले मनाए जाने वाले 'मसान की होली' आयोजन को लेकर एक बार फिर विवाद गहराया है। इस आयोजन में बड़ी संख्या में लोग जलती चिताओं और भस्म के बीच होली खेलते हैं। काशी विद्वत परिषद के प्रो. विनय कुमार पांडे ने इस पर आपत्ति जताई है और इसे सनातन धर्म का मजाक बताते हुए कहा कि इससे समाज में विकृति फैलेगी।
प्रो. विनय कुमार पांडे ने मीडिया से बातचीत में बताया कि शास्त्रों में इस तरह के आयोजन का कहीं उल्लेख नहीं है। मणिकर्णिका घाट और हरिश्चंद्र घाट शोक स्थल हैं और मृतकों की अंतिम यात्रा के लिए मोक्ष की कामना के लिए उनका आध्यात्मिक महत्व है।
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उनका कहना है कि शोक और पीड़ा में बैठे परिजनों के बीच नाच-गाना या परंपरा के नाम पर इस प्रकार का आयोजन करना सनातन धर्म को कलंकित करने जैसा है। उन्होंने चेतावनी दी कि इस आयोजन से समाज में विकृति फैल सकती है और यह अमर्यादित है।
मसान की होली में हर साल लाखों लोग शामिल होते हैं। यह आयोजन खासतौर पर युवाओं के बीच लोकप्रिय है। कई धर्माचार्यों ने पहले भी इस पर आपत्ति जताई थी कि गृहस्थ जीवन में व्यस्त लोगों को इस प्रकार के आयोजन में शामिल होना उचित नहीं है।
वाराणसी में मसान की होली का आयोजन (फोटो सोर्स- इंटरनेट)
स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा अधिकारियों के अनुसार, भीड़ की संख्या और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए विभिन्न व्यवस्थाएं की जाती हैं। इसके बावजूद विद्वानों का कहना है कि धार्मिक और आध्यात्मिक स्थल पर इस तरह के आयोजन से परंपरा का उल्लंघन होता है।
पिछले कुछ वर्षों से मसान की होली पर बड़ी संख्या में लोग शामिल होते हैं और यह कार्यक्रम सोशल मीडिया और स्थानीय मीडिया में भी खूब चर्चित होता है। पर्यटक और श्रद्धालु इस अनोखे आयोजन को देखने पहुंचते हैं। हालांकि, विद्वानों और धर्माचार्यों का कहना है कि यह परंपरा के मूल उद्देश्य के विपरीत है।
प्रो. पांडे ने स्पष्ट किया कि मणिकर्णिका घाट और हरिश्चंद्र घाट मृतकों के अंतिम संस्कार और मोक्ष की कामना के लिए अत्यंत पवित्र स्थल हैं। ऐसे आयोजनों से धार्मिक स्थल का महत्व कम हो सकता है और समाज में गलत संदेश जा सकता है।
हालांकि, विद्वानों का मानना है कि आध्यात्मिक स्थलों पर ऐसी आधुनिक प्रथाओं से परंपरा और संस्कृति दोनों प्रभावित हो सकती हैं। उन्होंने लोगों से अपील की है कि धार्मिक स्थलों पर श्रद्धा और परंपरा का सम्मान बनाए रखें।
Disclaimer: यह सूचना मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है। किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें। डाइनामाइट न्यूज़ इसकी पुष्टि नहीं करता है।