सुप्रीम कोर्ट के दो बड़े फैसलों ने क्यों बढ़ाई देशभर में चर्चा? ड्रग्स माफिया से लेकर शादीशुदा बेटियों तक पर आया ऐतिहासिक फैसला

Excerpt: सुप्रीम कोर्ट ने ड्रग्स तस्करी के मामलों में राष्ट्रीय हित को व्यक्तिगत स्वतंत्रता से ऊपर बताते हुए एक आरोपी की जमानत रद्द कर दी। वहीं दूसरी ओर अदालत ने शादीशुदा बेटियों को भी आश्रित कोटे का हकदार मानते हुए महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

Post Published By: Suresh Prajapati
Updated : 3 June 2026, 11:13 AM IST

New Delhi: सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में दो महत्वपूर्ण फैसले सुनाते हुए कानून, समाज और राष्ट्रीय हित से जुड़े अहम मुद्दों पर अपनी स्पष्ट राय रखी है। एक ओर अदालत ने ड्रग्स तस्करी के मामले में सख्त रुख अपनाते हुए आरोपी की जमानत रद्द कर दी, वहीं दूसरी ओर शादीशुदा बेटियों के अधिकारों को लेकर ऐतिहासिक फैसला सुनाया।

देश की संप्रभुता व्यक्तिगत स्वतंत्रता से ऊपर : सुप्रीम कोर्ट

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट द्वारा दी गई जमानत को रद्द करते हुए कहा कि यदि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता और देश की संप्रभुता के बीच टकराव की स्थिति हो तो राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। अदालत ने कहा कि ड्रग्स तस्करी केवल स्वास्थ्य के लिए खतरा नहीं है, बल्कि यह देश की अर्थव्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था को भी प्रभावित करती है।

पीठ ने माना कि आरोपी पर जेल के भीतर से मोबाइल फोन के जरिए ड्रग्स नेटवर्क संचालित करने के आरोप हैं और उसके खिलाफ पहले भी इसी तरह के मामले दर्ज हैं। ऐसे में दोबारा अपराध की आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

ड्रग्स कारोबारियों के खिलाफ सख्ती जरूरी

एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मादक पदार्थों का कारोबार करने वालों के खिलाफ बेहद कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए। अदालत ने टिप्पणी की कि ऐसे लोग देश की युवा पीढ़ी का भविष्य बर्बाद कर रहे हैं। कोर्ट ने एनडीपीएस एक्ट के तहत गिरफ्तार आरोपी की जमानत याचिका खारिज करते हुए मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।

शादीशुदा बेटियां भी आश्रित कोटे की हकदार

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि विवाह के बाद बेटी का अपने मायके से रिश्ता समाप्त नहीं होता। जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने स्पष्ट किया कि किसी महिला की वैवाहिक स्थिति उसके अधिकारों और पात्रता का निर्धारण नहीं कर सकती।

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कुलसुम निशा को मिला न्याय

मामला उत्तर प्रदेश के अमेठी जिले की कुलसुम निशा से जुड़ा था। उनकी मां उचित दर दुकान संचालित करती थीं। मां की मृत्यु के बाद कुलसुम ने आश्रित कोटे में दुकान आवंटन के लिए आवेदन किया था, लेकिन विवाहित होने के आधार पर आवेदन खारिज कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्णय को रद्द करते हुए संबंधित अधिकारियों को चार सप्ताह के भीतर दुकान आवंटित करने का निर्देश दिया।

अदालत ने कहा कि आश्रित कोटे की वास्तविक कसौटी आवेदक की आर्थिक निर्भरता, आवश्यकता और पात्रता होनी चाहिए, न कि उसका वैवाहिक दर्जा।

Location :  New Delhi

Published :  3 June 2026, 11:13 AM IST