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पूर्व कार्यवाहक प्रधानमंत्री गुलजारी लाल नंदा (Img: Pinterest)
New Delhi: भारतीय राजनीति में कुछ नाम ऐसे हैं, जिनकी पहचान केवल उनके पद से नहीं, बल्कि उनके चरित्र और मूल्यों से होती है। गुलजारी लाल नंदा ऐसे ही विरले नेताओं में शामिल थे। देश के दो बार कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनने के बावजूद उन्होंने कभी सत्ता का मोह नहीं रखा। गांधीवादी विचारधारा, सादगीपूर्ण जीवन और श्रमिकों के अधिकारों के लिए आजीवन संघर्ष करने वाले नंदा का जीवन आज भी राजनीति में नैतिकता का सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है।
गुलजारी लाल नंदा का जन्म 4 जुलाई 1898 को तत्कालीन अविभाजित भारत के सियालकोट (अब पाकिस्तान) में हुआ था। प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने लाहौर, आगरा और इलाहाबाद में उच्च शिक्षा प्राप्त की। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में उन्होंने श्रम समस्याओं पर शोध किया और बाद में मुंबई के नेशनल कॉलेज में अर्थशास्त्र के प्राध्यापक बने। हालांकि, महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से प्रेरित होकर उन्होंने नौकरी छोड़ दी और स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े।
1922 से 1946 तक नंदा अहमदाबाद टेक्सटाइल लेबर एसोसिएशन के सचिव रहे। उन्होंने मजदूरों के अधिकारों की लड़ाई को नई दिशा दी और श्रमिक कल्याण को अपना मिशन बनाया। स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने के कारण उन्हें 1932 और 1942 के आंदोलनों के दौरान जेल भी जाना पड़ा, लेकिन उनके सिद्धांत कभी नहीं डगमगाए।
स्वतंत्रता के बाद नंदा ने देश की विकास योजनाओं को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई। वे योजना आयोग के उपाध्यक्ष बने और बाद में योजना, सिंचाई, बिजली, श्रम एवं रोजगार जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाली। पंचवर्षीय योजनाओं को प्रभावी बनाने और श्रम नीतियों को नई दिशा देने में उनका योगदान उल्लेखनीय माना जाता है।
27 मई 1964 को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद गुलजारी लाल नंदा ने पहली बार देश के कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। इसके बाद 11 जनवरी 1966 को ताशकंद में लाल बहादुर शास्त्री के निधन के बाद एक बार फिर उन्होंने देश की बागडोर संभाली।
हालांकि दोनों बार उनका कार्यकाल अल्पकालिक रहा, लेकिन संकट की घड़ी में लोकतंत्र ने जिस नेता पर सबसे अधिक भरोसा जताया, वह गुलजारी लाल नंदा ही थे।
1967 में उन्होंने हरियाणा को अपनी कर्मभूमि बनाया और कैथल से लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुंचे। 1968 में उन्होंने कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अगले दो दशकों तक उन्होंने कुरुक्षेत्र के धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विकास के लिए लगातार काम किया। आज कुरुक्षेत्र की जो पहचान देश-दुनिया में है, उसमें नंदा के योगदान को विशेष रूप से याद किया जाता है।
गुलजारी लाल नंदा के जीवन का सबसे भावुक पहलू उनका अंतिम समय रहा। दो बार देश के सर्वोच्च पद की जिम्मेदारी निभाने वाले इस नेता ने कभी सरकारी सुविधाओं या विशेषाधिकारों का लाभ नहीं उठाया। जीवन के अंतिम वर्षों में आर्थिक तंगी के कारण उन्हें किराया न चुका पाने पर मकान तक खाली करना पड़ा। इसके बावजूद उन्होंने कभी किसी से शिकायत नहीं की और सादगी तथा आत्मसम्मान के साथ जीवन बिताया।
गुलजारी लाल नंदा केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि ईमानदारी, सादगी और राष्ट्रसेवा के प्रतीक थे। उन्होंने साबित किया कि नेतृत्व का वास्तविक अर्थ सत्ता नहीं, बल्कि सेवा, चरित्र और सिद्धांत होते हैं। उनके जीवन की कहानी आज भी हर जनप्रतिनिधि और युवा के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
आज उनकी जयंती पर देश उस महान गांधीवादी नेता को श्रद्धापूर्वक नमन करता है, जिसने सत्ता से अधिक राष्ट्रहित और नैतिक मूल्यों को महत्व दिया।
Location : New Delhi
Published : 4 July 2026, 10:56 AM IST
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