क्या नेतन्याहू के जाने से बदलेगी फिलिस्तीनियों की तकदीर? इजरायली सियासत की कड़वी सच्चाई

इजराइल में 27 अक्टूबर को होने वाले आम चुनाव से फिलिस्तीनियों के जीवन में किसी बड़े बदलाव की उम्मीद बेहद कम है। प्रधानमंत्री नेतन्याहू के विरोध में खड़ी अधिकांश विपक्षी पार्टियां भी फिलिस्तीन को अलग देश बनाने के पक्ष में नहीं हैं।

Updated : 23 October 2026, 9:25 AM IST
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New Delhi: इजराइल में आगामी 27 अक्टूबर को होने वाले आम चुनाव में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का राजनीतिक भविष्य तय होगा, लेकिन इस चुनाव से फिलिस्तीनियों के जीवन में किसी बड़े सकारात्मक बदलाव की संभावना बेहद कम है। इसकी मुख्य वजह यह है कि नेतन्याहू के विरोध में उतरी अधिकांश विपक्षी पार्टियां भी फिलिस्तीन को एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता देने के पक्ष में नहीं हैं। गाजा में संघर्ष शुरू होने के बाद से इजराइली संसद में फिलिस्तीनियों के खिलाफ कई प्रस्तावों को व्यापक समर्थन मिला है।

वैचारिक बदलाव: वामपंथ का नरम रुख और 7 अक्टूबर के बाद की हकीकत

पारंपरिक रूप से दुनिया भर की वामपंथी पार्टियां गरीबों की मदद, सरकारी खर्च बढ़ाने और प्रवासियों के अधिकारों की वकालत करती हैं, जबकि दक्षिणपंथी दल मजबूत सीमाओं और राष्ट्रीय पहचान पर जोर देते हैं। इजराइल में भी वामपंथ और दक्षिणपंथ का यह फर्क मुख्य रूप से फिलिस्तीन के प्रति उनके दृष्टिकोण से तय होता रहा है।

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पुराना समीकरण: वामपंथी दल बातचीत और जमीन के समझौते के जरिए फिलिस्तीन विवाद सुलझाने के पक्ष में थे।

बदला हुआ परिदृश्य: 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमलों के बाद इजराइल की पूरी राजनीति दक्षिणपंथ की ओर मुड़ गई है। अब वामपंथी दल भी इस संवेदनशील मुद्दे को छूने से बच रहे हैं, जिससे सत्ता परिवर्तन के बावजूद फिलिस्तीनियों के हालात जस के तस बने रहने की आशंका है।

इजराइली संसद (नेसेट) का समीकरण और अब तक की सबसे कट्टर सरकार

इजराइल की 120 सीटों वाली संसद (नेसेट) में आज तक किसी भी पार्टी को अपने दम पर बहुमत (कम से कम 61 सीटें) नहीं मिला है, जिसके कारण हमेशा गठबंधन सरकारों का दौर रहा है।

नवंबर 2022 के चुनाव में नेतन्याहू की दक्षिणपंथी पार्टी 'लिकुड' 32 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी।

इसके बाद लिकुड ने 'शास', 'यूनाइटेड तोराह जूडिज्म' और 'धार्मिक जायनिज्म' (धार्मिक जायनिज्म व ओत्जमा येहुदित) जैसे दलों के साथ मिलकर 64 सीटों का मजबूत और इतिहास का सबसे कट्टर दक्षिणपंथी गठबंधन तैयार किया।

इस सरकार में बेजालेल स्मोट्रिच (वित्त मंत्री व वेस्ट बैंक के नागरिक मामलों के प्रभारी) और इतमर बेन ग्विर (राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री) जैसे कट्टर नेताओं ने कब्जे वाले इलाकों को इजराइल में मिलाने और बस्तियों के विस्तार की पुरजोर मांग उठाई है।

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विपक्ष की स्थिति और अरब पार्टियों की भूमिका

इजराइल में विपक्ष का मतलब यह कतई नहीं है कि सभी विरोधी दल वामपंथी हैं। वहां का राजनीतिक विपक्ष भी विभिन्न विचारधाराओं में बंटा हुआ है-

मध्यमार्गी और दक्षिणपंथी विपक्ष: पिछली संसद में यायर लापिड की 'येश अतिद' (24 सीटें) और बेनी गैंट्ज की 'ब्लू एंड व्हाइट' प्रमुख मध्यमार्गी विपक्षी पार्टियां थीं। वहीं, एविगडोर लिबरमैन की 'यिसराइल बेइतेनु' धर्मनिरपेक्ष और दक्षिणपंथी पार्टी है। लेबर पार्टी (अब डेमोक्रेट्स का हिस्सा) ही एकमात्र ऐसी प्रमुख यहूदी पार्टी थी जो दो अलग देशों के गठन का खुलकर समर्थन करती थी।

अरब नेतृत्व वाली पार्टियां: यह समूह इजराइल के फिलिस्तीनी नागरिकों का प्रतिनिधित्व करता है और फिलिस्तीनी क्षेत्रों पर कब्जे का विरोध करता है। 2021 में 'राम' पार्टी इजराइल की सरकार में शामिल होने वाली पहली अरब पार्टी बनी थी, जबकि 'हदाश', 'ताल' और 'बालाद' जैसी पार्टियां गठबंधन से दूर रहकर चुनावी मैदान में उतरी हैं।

Location :  New Delhi

Published :  23 October 2026, 9:25 AM IST

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