भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर तारीख पर तारीख, अमेरिका दिखा रहा हरी झंडी, पर भारत क्यों बरत रहा एहतियात?

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और विदेश मंत्री मार्को रुबियो भले ही भारत के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौते के 'बेहद करीब' होने का दावा कर रहे हों, लेकिन भारत हर शर्त की फूंक-फूंक कर जांच कर रहा है।

Post Published By: Priyam Kashyap
Updated : 25 October 2026, 1:12 PM IST
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New Delhi: अमेरिका और भारत के बीच प्रस्तावित बाइलेटरल ट्रेड एग्रीमेंट को लेकर चर्चा एक बार फिर तेज हो गई है। अमेरिकी प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि दोनों देश एक एग्रीमेंट पर पहुंचने के बहुत करीब हैं। अमेरिकी सेक्रेटरी ऑफ स्टेट मार्को रुबियो ने भी दावा किया है कि 99 परसेंट बातचीत पूरी हो चुकी है। फिर भी बार-बार इस बात के संकेत मिलने के बावजूद कि एग्रीमेंट जल्द ही होने वाला है, कोई फॉर्मल अनाउंसमेंट नहीं किया गया है। इससे एक सवाल उठता है अगर वॉशिंगटन इस डील को लेकर इतना कॉन्फिडेंट दिख रहा है, तो नई दिल्ली हर एक टर्म एंड कंडीशन की इतनी बारीकी से जांच क्यों कर रही है?

ट्रंप बोले- समझौता पहले हुए करारों से अलग होगा

ओवल ऑफिस में रिपोर्टर्स से बात करते हुए डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि भारत एक एग्रीमेंट के लिए उत्सुक है और अमेरिका भी उतना ही तैयार है। उनके मुताबिक, दोनों देश एक डील के करीब हैं एक ऐसी डील जो अमेरिका द्वारा दूसरे देशों के साथ किए गए एग्रीमेंट्स से अलग होगी।

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इससे पहले मार्को रुबियो ने भी एक एग्रीमेंट पर साइन होने की संभावना का संकेत दिया था। हालांकि, बातचीत खत्म करने और फॉर्मल सहमति पर पहुंचने में अंतर होता है। ऐसे एग्रीमेंट को फाइनल करने के लिए बाकी मुद्दों पर आम सहमति, टर्म्स एंड कंडीशंस के बारे में क्लैरिटी और दोनों देशों से फॉर्मल अप्रूवल की जरूरत होती है।

भारत क्यों कर रहा है हर शर्त की जांच?

भारत का सतर्क रवैया एग्रीकल्चर, घरेलू इंडस्ट्रीज, एक्सपोर्टर्स के हितों और बड़ी इकोनॉमिक पॉलिसीज से जुड़ी चिंताओं की वजह से है। बातचीत से जुड़े सोर्स के हवाले से रिपोर्ट्स बताती हैं कि भारत की मुख्य चिंता यह पक्का करना है कि एग्रीमेंट की शर्तें देश के इकोनॉमिक और स्ट्रेटेजिक हितों के हिसाब से हों।

ट्रेड ऑर्गनाइजेशन, एग्रीकल्चर ग्रुप्स और अलग-अलग घरेलू पॉलिसी स्टेकहोल्डर्स ने प्रपोज्ड डील को लेकर ऑब्जेक्शन उठाए हैं। इन चिंताओं में कथित तौर पर डेटा लोकलाइजेशन जैसे मुद्दे शामिल हैं देश के अंदर डेटा स्टोर करने की जरूरत। हालांकि, फाइनल आम सहमति या असहमति के पॉइंट्स के बारे में कोई पूरी ऑफिशियल डिटेल्स पब्लिक नहीं की गई हैं।

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भारत के लिए यह पक्का करना भी जरूरी है कि दूसरे देशों के सामान के मुकाबले भारतीय प्रोडक्ट्स को अमेरिका मार्केट में कॉम्पिटिटिव नुकसान का सामना न करना पड़े। अक्टूबर की शुरुआत में फाइनेंस मिनिस्टर निर्मला सीतारमण ने कहा था कि बातचीत एक ऐसे स्टेज पर पहुंच गई है जहां दोनों पक्षों के लिए और रियायतें देना मुश्किल हो रहा है।

कृषि और किसानों के हित सबसे अहम मुद्दों में

भारत-अमेरिका ट्रेड बातचीत में खेती का सेक्टर लंबे समय से एक सेंसिटिव मुद्दा रहा है। भारत का मकसद अपने किसानों और घरेलू खेती के बाजार को विदेशी कॉम्पिटिशन से बचाना है। इसलिए देश डेयरी, पोल्ट्री, गेहूं और चावल जैसे खेती के प्रोडक्ट्स के लिए मार्केट एक्सेस से जुड़े रेगुलेशन को लेकर सावधानी बरत रहा है।

भारतीय बाजार में ज्यादा एक्सेस की अमेरिका की मांग और भारत की अपने सेंसिटिव सेक्टर्स को सुरक्षित रखने की जरूरत के बीच बैलेंस बनाना कोई आसान काम नहीं है। किसी भी संभावित एग्रीमेंट में बताई गई मार्केट खोलने की शर्तें किसानों, फूड प्रोड्यूसर्स और घरेलू बिजनेस पर काफी असर डाल सकती हैं। इसलिए भारत के लिए सिर्फ एग्रीमेंट की टाइमलाइन ही मायने नहीं रखती, बल्कि इसके लंबे समय के असर भी मायने रखते हैं।

टैरिफ और रूस से तेल खरीदने का मुद्दा भी अहम

टैरिफ इंपोर्ट और एक्सपोर्ट पर लगाई जाने वाली ड्यूटी भी ट्रेड एग्रीमेंट में अहम भूमिका निभाती हैं। फरवरी 2026 में दोनों देश एक शुरुआती फ्रेमवर्क पर सहमत हुए, जिसमें भारतीय प्रोडक्ट्स के एक बड़े हिस्से पर अमेरिका टैरिफ को 50 परसेंट से घटाकर 18 परसेंट करने का प्रस्ताव शामिल था। हालांकि, यह शुरुआती फ्रेमवर्क फाइनल एग्रीमेंट में नहीं बदल पाया, और टैरिफ सिस्टम में बाद के बदलावों ने बातचीत को और मुश्किल बना दिया।

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इसके अलावा रूस से भारत का कच्चा तेल खरीदना दोनों देशों के रिश्तों में तनाव का कारण रहा है। अमेरिका एडमिनिस्ट्रेशन ने ट्रेड और बैन पर चर्चा के दौरान इस मुद्दे को उठाया है, जबकि भारत का कहना है कि तेल खरीदने के उसके फैसले उसकी एनर्जी जरूरतों और देश के हितों पर आधारित हैं। अक्टूबर में रूस से तेल खरीदने के संबंध में US बैन में ढील के बाद नई चर्चाएं शुरू हुईं फिर भी इससे सभी मौजूदा मतभेद हल नहीं हुए।

99 प्रतिशत काम पूरा’ होने का क्या मतलब?

मार्को रुबियो ने कहा कि लगभग 99 परसेंट एग्रीमेंट फाइनल हो चुका है, और बाकी बचे मुद्दों पर आम सहमति बनने के बाद बाकी काम पूरा किया जा सकता है। उन्होंने यह भी साफ किया कि बाकी रुकावटें सिर्फ टेक्निकल फॉर्मैलिटी नहीं हैं; बल्कि वे इस्तेमाल किए गए टर्म्स एंड कंडीशंस के खास असर से जुड़ी हैं।

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यह बातचीत का सबसे जरूरी पहलू है। किसी एग्रीमेंट का ज्यादातर हिस्सा तय होने और हर एक शर्त पर आखिरी सहमति बनने में साफ फर्क होता है। एक ट्रेड एग्रीमेंट में भाषा का चुनाव सबसे जरूरी होता है, क्योंकि यह तय करता है कि भविष्य में खास नियम कैसे लागू किए जाएंगे।

Location :  New Delhi

Published :  25 October 2026, 1:12 PM IST

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