
बांग्लादेश हिंसा (Img: Google)
New Delhi: बांग्लादेश में मुहम्मद यूनुस की सरकार को सत्ता में आए करीब डेढ़ साल हो चुके हैं। देश में हिंसा और कट्टरपंथ लगातार बढ़ता जा रहा है। हालात ऐसे हैं कि जो कट्टरपंथी समूह पहले यूनुस सरकार के समर्थक थे। वही अब सेक्युलर नीतियों से पीछे हटने के आरोप लगा रहे हैं। इंकलाब मंच के प्रवक्ता शरीफ उस्मान हादी की हत्या के बाद हालात और ज्यादा बिगड़ गए हैं। फरवरी 2026 में होने वाले चुनाव से पहले ये कट्टरपंथी ताकतें जानबूझकर हिंसा फैलाने की कोशिश कर रही हैं। इसका सबसे ज्यादा असर बांग्लादेशी अल्पसंख्यकों, खासकर हिंदू समुदाय पर देखने को मिल रहा है।
जमात-ए-इस्ला: शेख हसीना के शासनकाल में प्रतिबंधित जमात-ए-इस्लामी को यूनुस सरकार के सत्ता में आते ही राहत मिली। जिसके बाद यह संगठन फिर से सक्रिय हो गया। यह समूह चुनाव सुधारों की मांग के साथ-साथ अल्पसंख्यकों पर हमलों और भारत विरोधी प्रदर्शनों में भी सक्रिय भूमिका निभा रहा है। जमात-ए-इस्लामी पर पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI से जुड़े होने के आरोप भी लगते रहे हैं। इस संगठन को शरीफ उस्मान हादी की हत्या का फायदा मिल सकता है।
हिफाजत-ए-इस्लाम: कट्टरपंथ को बढ़ावा देने में हिफाजत-ए-इस्लाम की भूमिका भी अहम मानी जा रही है। एक रिपोर्ट के अनुसार, यह संगठन सुन्नी इस्लामवादियों और बड़े मदरसा नेटवर्क के सहारे काम करता है। महिलाओं के अधिकारों और सेक्युलर सुधारों का खुलकर विरोध करता है। महिलाओं को संपत्ति में बराबरी का अधिकार देने के प्रस्ताव के खिलाफ संगठन ने बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किए थे। इसके नेता मामुनुल हक ने यूनुस से मुलाकात कर बांग्लादेश में शरिया कानून लागू करने का दबाव भी बनाया। यह संगठन भी शेख हसीना के कार्यकाल में प्रतिबंधित था लेकिन यूनुस सरकार में इसे राहत मिली।
हिफाजत-ए-इस्लाम: इसी तरह हिज्ब-उत-तहरीर भी बांग्लादेश में तेजी से अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है। एस. राजारतनम स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज की रिपोर्ट के मुताबिक, यह संगठन सोशल मीडिया और शिक्षण संस्थानों के जरिए युवाओं की भर्ती कर रहा है। खलीफा बहाली और शरिया कानून की मांग करने वाला यह संगठन 2009 में प्रतिबंधित किया गया था। फिर 2024 में सक्रिय हो गया। यूनुस सरकार के दौरान ढाका में इसके बड़े प्रदर्शन देखने को मिले, जिनमें ISIS जैसे झंडे लहराने की तस्वीरें भी सामने आईं। सरकार पर आरोप है कि वह इस संगठन को रोकने में नाकाम रही है।
इंकलाब मंच: अल जजीरा की रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई 2024 के छात्र आंदोलन के बाद बने इंकलाब मंच ने भी हालात को और तनावपूर्ण बना दिया है। इस संगठन के नेता शरीफ उस्मान हादी एंटी-इंडिया और कट्टर विचारों के लिए जाने जाते थे। उनकी हत्या के बाद इंकलाब मंच ने यूनुस सरकार को गिराने की धमकी दी और हालात इतने बिगड़े कि कई जगह हिंसा भड़क उठी और अखबारों के दफ्तर तक जला दिए गए। यह संगठन भी देश में कट्टर इस्लामिक संस्कृति लागू करने की वकालत करता है।
मामुनुल हक और मुफ्ती जशीमुद्दीन रहमानी: दोनों कट्टरपंथी नेताओं की रिहाई को भी हालात बिगड़ने की बड़ी वजह माना जा रहा है। मुफ्ती जशीमुद्दीन रहमानी अल-कायदा से जुड़े आतंकी संगठन अंसारुल्लाह बंग्ला टीम का प्रमुख रहा है। उसकी रिहाई से भारत की सुरक्षा चिंताएं बढ़ गई हैं। यह संगठन स्लीपर सेल्स के जरिए जिहादी नेटवर्क खड़ा करने की कोशिश कर रहा है। वहीं मामुनुल हक पहले हिंसा भड़काने के आरोप में जेल में था। रिहा होने के बाद फिर से सक्रिय हो गया है।
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ये संगठन मिलकर शरिया कानून से जुड़े बदलावों की मांग कर रहे हैं। महिलाओं के अधिकारों पर रोक लगाने की कोशिशें तेज कर रहे हैं और खुले तौर पर एंटी-इंडिया नारों को बढ़ावा दे रहे हैं। कई रिपोर्ट्स में इनके पाकिस्तान और अन्य विदेशी ताकतों से संबंध होने के दावे किए गए हैं। यूनुस सरकार पर लगातार सवाल उठ रहे हैं कि वह इन कट्टरपंथी ताकतों पर प्रभावी नियंत्रण नहीं कर पा रही।
Location : New Delhi
Published : 23 December 2025, 3:54 PM IST