
प्रसुता की मौत के बात मचा बवाल (Img: Dynamite News)
Deoghar: देवघर जिले के सारवां सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में प्रसूता की मौत के बाद लोगों का गुस्सा खुलकर सामने आ गया। अस्पताल परिसर में सैकड़ों ग्रामीणों की भीड़ जमा हो गई और स्वास्थ्य व्यवस्था के खिलाफ नारेबाजी शुरू हो गई। यह विरोध केवल एक परिवार के दुख तक सीमित नहीं था, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों की चिकित्सा व्यवस्था को लेकर लंबे समय से उठ रहे सवालों का विस्फोट भी था।
घटना के बाद पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय यही बना हुआ है कि अगर समय रहते बेहतर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध होती तो क्या एक महिला की जान बचाई जा सकती थी।
मृतका के परिजनों के अनुसार महिला को प्रसव पीड़ा होने पर सारवां सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराया गया था। अस्पताल में सामान्य प्रक्रिया के तहत प्रसव कराया गया और परिवार में बच्चे के जन्म की खुशी भी आई। लेकिन यह खुशी ज्यादा देर तक नहीं टिक सकी। परिजनों का आरोप है कि प्रसव के कुछ समय बाद महिला की तबीयत तेजी से बिगड़ने लगी। अत्यधिक रक्तस्राव की स्थिति बनने के बाद अस्पताल प्रशासन ने उसे देवघर सदर अस्पताल रेफर कर दिया। परिवार इलाज की उम्मीद में एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल तक भागता रहा, लेकिन अंततः महिला जिंदगी की जंग हार गई।
घटना के बाद परिजनों ने अस्पताल कर्मियों पर प्रसव कराने के नाम पर पैसे मांगने का आरोप भी लगाया। हालांकि प्रशासन की ओर से अभी तक इस आरोप की पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन इस दावे ने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है।ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों ने आरोपों की निष्पक्ष जांच कराने की मांग उठाई है ताकि सच्चाई सामने आ सके और अगर कोई दोषी पाया जाए तो उसके खिलाफ कार्रवाई हो।
जैसे ही प्रसूता की मौत की खबर गांव और आसपास के क्षेत्रों में पहुंची, बड़ी संख्या में लोग अस्पताल पहुंच गए। देखते ही देखते अस्पताल परिसर में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया। ग्रामीणों का कहना था कि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में अक्सर गंभीर मरीजों को प्राथमिक उपचार के बाद रेफर कर दिया जाता है। उनका सवाल था कि अगर हर जटिल मामले में मरीज को दूसरे अस्पताल भेजना ही समाधान है, तो ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों की उपयोगिता क्या रह जाती है?
स्थिति बिगड़ते देख पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को मौके पर पहुंचना पड़ा। अधिकारियों ने जांच का आश्वासन दिया, जिसके बाद प्रदर्शन समाप्त हुआ।
घटना के बाद अस्पताल प्रबंधन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए दो एएनएम, रिंकू मंडल और रीमा दास को प्रसव कक्ष की ड्यूटी से हटा दिया है। हालांकि इस कार्रवाई के बाद नए सवाल खड़े हो गए हैं। अगर अस्पताल प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि प्रथम दृष्टया कोई लापरवाही सामने नहीं आई है, तो फिर कर्मचारियों को हटाने की जरूरत क्यों पड़ी?
देवघर के सिविल सर्जन डॉ. रमेश कुमार ने मामले में कहा है कि अस्पताल में प्रसव सामान्य रूप से कराया गया था और आवश्यक प्रक्रिया के तहत मरीज को रेफर किया गया। उनके अनुसार प्रारंभिक जांच में किसी प्रकार की लापरवाही सामने नहीं आई है और पूरे मामले की जांच कराई जा रही है। लेकिन लोगों का कहना है कि जब परिजन गंभीर आरोप लगा रहे हैं और दो स्वास्थ्यकर्मियों को प्रसव कार्य से हटाया गया है, तो मामले को पूरी तरह सामान्य कैसे माना जा सकता है? यही कारण है कि सिविल सर्जन की सफाई के बाद भी विवाद थमता नजर नहीं आ रहा।
यह घटना केवल एक प्रसूता की मौत तक सीमित नहीं है। झारखंड के कई ग्रामीण इलाकों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी, सीमित संसाधन और आपातकालीन चिकित्सा सुविधाओं के अभाव की शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार प्रसव के बाद होने वाला अत्यधिक रक्तस्राव मातृ मृत्यु के प्रमुख कारणों में शामिल है। ऐसी स्थिति में शुरुआती कुछ घंटे बेहद महत्वपूर्ण होते हैं।
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झारखंड सरकार लगातार स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के दावे करती रही है। स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी भी कई बार अस्पतालों के आधुनिकीकरण और बेहतर चिकित्सा सुविधाओं की बात कह चुके हैं। लेकिन सारवां की यह घटना उन दावों की जमीनी हकीकत पर बहस छेड़ रही है। ग्रामीणों का कहना है कि स्वास्थ्य व्यवस्था की सफलता केवल घोषणाओं और योजनाओं से नहीं, बल्कि उस मरीज की जिंदगी से तय होती है जो अस्पताल पहुंचने के बाद सुरक्षित घर लौट सके।फिलहाल पूरे मामले की जांच जारी है।
Location : Deoghar
Published : 5 June 2026, 5:29 PM IST