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प्रशासनिक व्यवस्था का कड़वा सच (Img- AI)
New Delhi: भारत की प्रशासनिक सेवा (IAS और IPS) में तबादला एक सामान्य प्रक्रिया मानी जाती है। लेकिन जब किसी अधिकारी का बार-बार ट्रांसफर होने लगे, तो यह व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है। देश में कई ऐसे अधिकारी रहे हैं जिन्होंने राजनीतिक दबाव और गलत फैसलों के आगे झुकने से इनकार कर दिया, जिसके बदले में उन्हें रिकॉर्ड तोड़ तबादले का सामना करना पड़ा।
हरियाणा कैडर के पूर्व आईएएस अधिकारी प्रदीप कासनी को अपने करीब 35 साल के सेवाकाल में लगभग 71 बार तबादले का सामना करना पड़ा। अपनी बेबाक शैली के लिए जाने जाने वाले कासनी का नाम सबसे ज्यादा ट्रांसफर झेलने वाले अधिकारियों में दर्ज है।
वहीं, 1991 बैच के आईएएस अशोक खेमका का नाम भी इस सूची में प्रमुखता से आता है, जिन्हें करीब 66 बार बदला गया। साल 2012 में रॉबर्ट वाड्रा और डीएलएफ जमीन सौदे की म्यूटेशन रद्द करने के बाद खेमका रातों-रात राष्ट्रीय सुर्खियों में आए थे।
उत्तर प्रदेश में आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक आईपीएस के.एल. मीना को उनके करियर में करीब 59 बार ट्रांसफर किया गया। इसी तरह महाराष्ट्र में पूर्व आईएएस अरुण भाटिया ने 26 साल की नौकरी में 26 बार तबादला देखा।
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वहीं, 2005 बैच के चर्चित आईएएस तुकाराम मुंढे को अब तक 20 से ज्यादा बार बदला जा चुका है। नाशिक में अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई हो या खाद्य एवं औषधि प्रशासन में सख्त निरीक्षण, मुंढे अपने कड़े रुख के लिए जाने जाते हैं।
कर्नाटक कैडर की 2000 बैच की आईपीएस अधिकारी डी. रूपा मौदगिल भी अपने कड़े फैसलों के लिए चर्चित रही हैं। साल 2017 में बेंगलुरु की परप्पना अग्रहारा जेल में एआईएडीएमके नेता वी.के. शशिकला को मिल रही विशेष सुविधाओं का भंडाफोड़ कर वे देश भर में चर्चा का विषय बनी थीं।
विशेषज्ञों का मानना है कि बार-बार होने वाले तबादलों से प्रशासनिक निरंतरता प्रभावित होती है और जनहित की योजनाओं की गति धीमी पड़ जाती है। हालांकि सरकार इसे नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया मानती है, लेकिन इन अधिकारियों का करियर दिखाता है कि राजनीतिक तंत्र और कर्तव्य के बीच संतुलन बनाना कितना चुनौतीपूर्ण है।
Location : New Delhi
Published : 28 August 2026, 12:18 PM IST