नीतीश कुमार के सक्रिय राजनीति से हटकर राज्यसभा जाने की चर्चा के बीच बिहार की राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत मिल रहे हैं। जेडीयू के सामने अपना सामाजिक आधार बचाने की चुनौती है, जबकि बीजेपी और आरजेडी के बीच सीधी राजनीतिक टक्कर की संभावना बढ़ती दिख रही है।

बिहार की राजनीति में बदलाव के संकेत (Img- Internet)
Patna: बिहार की राजनीति लंबे समय से समाजवादी विचारधारा और भगवा राजनीति के बीच टकराव और सहयोग के समीकरण के इर्द-गिर्द घूमती रही है। मुख्यमंत्री के रूप में नीतीश कुमार ने वर्षों तक राज्य की राजनीति पर मजबूत पकड़ बनाए रखी। हालांकि पिछले दो विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने अधिक सीटें जीतीं, लेकिन सत्ता के समीकरण में नीतीश कुमार की भूमिका हमेशा निर्णायक रही।
अब यदि नीतीश सक्रिय राजनीति से हटकर राज्यसभा की ओर रुख करते हैं, तो बिहार की राजनीति में नए समीकरण बनने की संभावना बढ़ सकती है। ऐसे में राज्य की राजनीति धीरे-धीरे दो ध्रुवों बीजेपी और आरजेडी के बीच सिमटती नजर आ सकती है।
नीतीश कुमार के हटने की स्थिति में जेडीयू के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने सामाजिक आधार को बनाए रखने की होगी। पार्टी का मुख्य समर्थन कुर्मी और अति पिछड़ा वर्ग (EBC) से आता है। इसके अलावा महिलाओं का बड़ा जाति-निरपेक्ष वोट बैंक भी पिछले दो चुनावों में एनडीए गठबंधन की जीत में अहम भूमिका निभाता रहा है।
जेडीयू के पास फिलहाल 85 विधायक और 12 लोकसभा सांसद हैं, जो पार्टी की मजबूत मौजूदगी को दिखाते हैं। लेकिन नीतीश की व्यक्तिगत लोकप्रियता के बिना इस आधार को बनाए रखना पार्टी के लिए आसान नहीं होगा।
बिहार की राजनीति में अति पिछड़ा वर्ग यानी EBC करीब 25 प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करता है। इसके अलावा ओबीसी के लव-कुश समीकरण कुर्मी और कोएरी भी चुनावी राजनीति में अहम भूमिका निभाते हैं।
नीतीश कुमार ने इन वर्गों के बीच अपनी मजबूत पकड़ बनाई थी। लेकिन अब बीजेपी भी इन सामाजिक समूहों में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर सकती है। ऐसे में जेडीयू के सामने अपने पारंपरिक वोट बैंक को बचाने की चुनौती और बड़ी हो सकती है।
नीतीश कुमार के बाद जेडीयू के सामने नेतृत्व का सवाल भी खड़ा हो सकता है। पार्टी में श्रवण कुमार, अशोक चौधरी और विजय कुमार चौधरी जैसे वरिष्ठ नेता जरूर हैं, लेकिन फिलहाल कोई ऐसा चेहरा नहीं दिखता जो राज्यभर में सर्वमान्य नेतृत्व दे सके।
इसी कारण अब कई राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी हो रही है कि नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार को पार्टी आगे बढ़ा सकती है। हालांकि राजनीति में उनकी सक्रियता अभी सीमित रही है, लेकिन उन्हें पार्टी का संभावित भविष्य माना जा रहा है।
राजनीति में उभर रहा नया शक्ति संतुलन (Img- Internet)
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह स्थिति बीजेपी के लिए एक बड़े अवसर की तरह भी हो सकती है। बिहार विधानसभा में 89 सीटों के साथ बीजेपी पहले से ही मजबूत स्थिति में है।
पार्टी आने वाले वर्षों में जेडीयू और अन्य सहयोगी दलों के साथ सत्ता में बने रहने की रणनीति बना सकती है। हालांकि राज्य स्तर पर मजबूत नेतृत्व की कमी बीजेपी के लिए एक चुनौती भी रही है।
सुशील मोदी के निधन के बाद बीजेपी को राज्य में एक मजबूत चेहरा तलाशने की जरूरत थी। ऐसे में सम्राट चौधरी को पार्टी के उभरते नेता के रूप में देखा जा रहा है। कुशवाहा समुदाय से आने वाले सम्राट चौधरी को बीजेपी के ओबीसी समीकरण को मजबूत करने के प्रयास के तौर पर भी देखा जा रहा है।
Rajya Sabha Election: बिहार में NDA के 5 उम्मीदवारों ने किया नामांकन, जीतना तय
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर नीतीश कुमार सक्रिय राजनीति से पीछे हटते हैं, तो बिहार की राजनीति अधिक ध्रुवीकृत हो सकती है। बीजेपी जहां अपने हिंदुत्व और विकास के एजेंडे को आगे बढ़ा सकती है, वहीं विपक्ष इसे वैचारिक लड़ाई के रूप में पेश करने की कोशिश कर सकता है।
ऐसे में आने वाले वर्षों में बिहार की राजनीति नए नेतृत्व, नए सामाजिक समीकरण और बदलते राजनीतिक गठबंधनों के साथ एक नए दौर में प्रवेश करती नजर आ सकती है।