नैनीताल स्थित कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में दुर्लभ स्पॉट-बेलीड ईगल आउल की मौजूदगी दर्ज की गई है। ढिकाला, सीतावनी और रिंगोड़ा रेंज में इसके दिखने से वन्यजीव प्रेमियों में उत्साह है। विशेषज्ञ इसे जंगल के स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र का संकेत मान रहे हैं।

कॉर्बेट में रहस्यमयी उल्लू की वापसी
Ramnagar: नैनीताल जिले में स्थित कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के ढिकाला क्षेत्र और आसपास के घने जंगल एक बार फिर एक दुर्लभ और रहस्यमयी पक्षी की मौजूदगी से गूंज उठे हैं। स्पॉट-बेलीड ईगल आउल नामक यह विशाल उल्लू हाल ही में रिजर्व के विभिन्न हिस्सों में देखा गया है। इसके अलावा रामनगर वन प्रभाग की सीतावनी और रिंगोड़ा रेंज में भी इसकी उपस्थिति दर्ज की गई है, जिससे वन्यजीव प्रेमियों और फोटोग्राफरों में उत्साह है।
यह उल्लू अपनी चमकीली नारंगी आंखों और रात में निकलने वाली कंपकंपी पैदा कर देने वाली आवाज के कारण ‘जंगल का भूत’ और ‘जंगल की चुड़ैल’ जैसे नामों से मशहूर है। लगभग 20 से 25 इंच लंबा और करीब दो किलो वजनी यह शिकारी पक्षी भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के घने जंगलों में पाया जाता है। दिन के समय यह पेड़ों की घनी छाया में छिपा रहता है और रात होते ही शिकार के लिए निकलता है।
इसके भोजन में छोटे स्तनधारी, मोर के बच्चे, खरगोश, छिपकलियां और अन्य छोटे जीव शामिल होते हैं। इसकी उपस्थिति जंगल में खाद्य श्रृंखला के संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
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विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी जंगल में शीर्ष शिकारी पक्षियों का पाया जाना वहां के पारिस्थितिकी तंत्र के स्वस्थ और संतुलित होने का संकेत होता है। स्पॉट-बेलीड ईगल आउल की मौजूदगी यह दर्शाती है कि कॉर्बेट का लैंडस्केप और जैव विविधता मजबूत स्थिति में है।
वन्यजीव विशेषज्ञ संजय छिब्वाल के अनुसार, इस पक्षी की रहस्यमयी आवाज पूरी तरह प्राकृतिक है। अंधविश्वास और लोककथाओं के कारण इसे अलौकिक रूप से जोड़ दिया गया था, जबकि वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि यह एक सामान्य रात्रिचर शिकारी पक्षी है।
प्रसिद्ध वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर दीप रजवार ने इस दुर्लभ उल्लू को अपने कैमरे में कैद किया है। उनके अनुसार, उन्हें इसे पहली बार ढिकाला, दूसरी बार सीतावनी और हाल ही में रिंगोड़ा क्षेत्र में देखने का अवसर मिला। कम समय में तीन बार इस प्रजाति का दिखना अपने आप में कॉर्बेट की समृद्ध जैव विविधता का प्रमाण है।
दशकों पहले ग्रामीण इलाकों में इस उल्लू को लेकर कई लोककथाएं प्रचलित थीं। रात के सन्नाटे में इसकी तेज आवाज को लोग किसी महिला के रोने की ध्वनि समझ बैठते थे और भयवश इसे ‘गांव की चुड़ैल’ कहने लगे। बाद में वन विभाग और वैज्ञानिकों की जागरूकता से यह भ्रम दूर हुआ।
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रामनगर वन प्रभाग के एसडीओ अंकित बड़ोला ने बताया कि मीडिया के माध्यम से उन्हें सीतावनी क्षेत्र में इसकी मौजूदगी की पुष्टि मिली। उन्होंने कहा कि शीर्ष शिकारी पक्षियों की सक्रियता किसी भी जंगल के पारिस्थितिक स्वास्थ्य का मजबूत संकेत है।
स्पॉट-बेलीड ईगल आउल का दिखना इस बात का प्रमाण है कि कॉर्बेट के जंगल अब भी प्राकृतिक रूप से समृद्ध और संतुलित हैं।