
इलाहाबाद हाई कोर्ट
Prayagraj: उत्तर प्रदेश में धर्म परिवर्तन से जुड़े मामलों को लेकर चल रहे विवादों के बीच इलाहाबाद हाई कोर्ट का एक ताज़ा फैसला प्रशासनिक व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है। अदालत ने साफ कहा है कि अगर कोई व्यक्ति कानून में तय सभी प्रक्रियाओं का पालन कर चुका है, तो प्रशासन केवल शक, जांच या अपनी संतुष्टि के नाम पर धर्म परिवर्तन की प्रक्रिया को रोक नहीं सकता। यह टिप्पणी न सिर्फ एक याचिका पर फैसला है, बल्कि उन तमाम मामलों के लिए एक सख्त संदेश भी है जहां वैधानिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी फाइलें महीनों तक अटकी रहती हैं।
यह मामला उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021 से जुड़ा है, जिसमें धर्म परिवर्तन को लेकर एक निर्धारित कानूनी प्रक्रिया तय की गई है। इसी प्रक्रिया के तहत याचिकाकर्ता डॉ. मोहम्मद एहसान उर्फ अनिल पंडित ने सनातन धर्म अपनाने के लिए सभी आवश्यक औपचारिकताएं पूरी की थीं।
प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी प्रशासनिक स्तर पर देरी के कारण याचिकाकर्ता को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा। विवाह पंजीकरण, पहचान पत्रों में बदलाव, सरकारी दस्तावेजों में नाम और धर्म अपडेट कराने जैसे जरूरी काम अटक गए।
Allahabad High Court की न्यायमूर्ति अजीत कुमार और न्यायमूर्ति इन्द्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए बेहद स्पष्ट टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि यदि कानून की धारा 8 और धारा 9 के तहत सभी प्रक्रियाएं पूरी हो चुकी हैं, तो प्रशासन के पास यह अधिकार नहीं है कि वह धर्म परिवर्तन को अनिश्चितकाल तक लंबित रखे या केवल संदेह के आधार पर उसे रोक दे। कोर्ट ने यह भी कहा कि व्यक्तिगत संतुष्टि या अतिरिक्त जांच के नाम पर वैधानिक प्रक्रिया को बाधित करना कानून की मंशा के खिलाफ है।
मामले में यह तथ्य सामने आया कि याचिकाकर्ता ने अधिनियम के तहत सभी जरूरी दस्तावेज, सूचना और औपचारिकताएं पूरी कर दी थीं। इसके बावजूद प्रशासनिक स्तर पर आवेदन को लंबे समय तक लंबित रखा गया। अदालत ने इस स्थिति को गंभीर मानते हुए कहा कि कानून का उद्देश्य प्रक्रिया को नियंत्रित करना है, न कि उसे रोककर नागरिक अधिकारों को बाधित करना।
सुनवाई के दौरान अदालत के हस्तक्षेप के बाद अपर जिलाधिकारी (प्रशासन), प्रयागराज ने याचिकाकर्ता के धर्म परिवर्तन संबंधी आवेदन को स्वीकार कर लिया। यह स्वीकारोक्ति इस बात का संकेत थी कि प्रक्रिया में कोई वैधानिक कमी नहीं थी, बल्कि केवल प्रशासनिक देरी के कारण मामला अटका हुआ था।
अंतिम आदेश में खंडपीठ ने स्पष्ट निर्देश दिया कि धर्म परिवर्तन से जुड़े सभी दस्तावेजी संशोधन, रिकॉर्ड अपडेट और अन्य आवश्यक वैधानिक कार्यवाहियां चार सप्ताह के भीतर पूरी की जाएं। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता को अपने कानूनी अधिकारों के प्रयोग में किसी भी प्रकार की बाधा नहीं आनी चाहिए।
Location : Prayagraj
Published : 30 May 2026, 1:53 PM IST