घर में रखा प्लास्टिक कहीं मातृत्व का दुश्मन तो नहीं? शोध में चौंकाने वाला खुलासा, महिलाओं में बढ़ा बांझपन का खतरा

एसएन मेडिकल कॉलेज के स्त्री रोग विभाग के शोध में 352 महिलाओं पर अध्ययन किया गया। बांझपन से जूझ रहीं महिलाओं में प्लास्टिक से जुड़े रसायन BPA की मात्रा अन्य महिलाओं की तुलना में करीब चार गुना अधिक मिली। शोधकर्ताओं ने हार्मोन और अंडाणुओं की गुणवत्ता में भी बदलाव की बात कही है। हालांकि, विशेषज्ञों के मुताबिक बांझपन के लिए केवल प्लास्टिक को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता।

Post Published By: Suresh Prajapati
Updated : 9 August 2026, 12:56 PM IST

Agra: रसोई में रखे प्लास्टिक के कप, टिफिन, पानी की बोतल और दूसरे बर्तन भले ही रोजमर्रा की जिंदगी आसान बनाते हों, लेकिन अब इन्हीं चीजों को लेकर एक चौंकाने वाली चिंता सामने आई है। एसएन मेडिकल कॉलेज के स्त्री रोग विभाग में हुए एक शोध में बांझपन से जूझ रहीं महिलाओं के शरीर में प्लास्टिक से जुड़े रसायन बिस्फेनॉल-ए यानी BPA की मात्रा अधिक पाई गई। शोध में यह भी सामने आया कि इन महिलाओं में BPA का स्तर अन्य महिलाओं की तुलना में करीब चार गुना ज्यादा था। विशेषज्ञों ने आशंका जताई है कि प्लास्टिक में इस्तेमाल होने वाला यह रसायन महिलाओं के हार्मोन, अंडाणुओं की गुणवत्ता और गर्भधारण की क्षमता को प्रभावित कर सकता है।

352 महिलाओं पर किया गया शोध

एसएन मेडिकल कॉलेज के स्त्री रोग विभाग में यह शोध 20 से 40 वर्ष की 352 महिलाओं पर किया गया। इनमें 230 महिलाएं शहरी क्षेत्र और 122 ग्रामीण इलाकों से थीं। शोध में शामिल महिलाओं में 240 गृहिणी थीं, जबकि 112 कामकाजी महिलाएं थीं। इनमें 176 महिलाएं ऐसी थीं, जिनके बच्चे थे। इनमें 128 महिलाओं का एक बच्चा और 48 महिलाओं के दो बच्चे थे। दूसरी ओर 176 महिलाएं बांझपन की समस्या से जूझ रही थीं। शोध सितंबर 2024 से मार्च 2026 के बीच किया गया। इस दौरान महिलाओं के रक्त और यूरिन के नमूनों की जांच हर तीन महीने में कराई गई। इसके लिए दिल्ली की एक मेडिकल रिसर्च यूनिट की लैब की मदद ली गई।

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बांझपन से जूझ रहीं महिलाओं में चार गुना ज्यादा मिला BPA

शोध के नतीजों में सबसे ज्यादा ध्यान बिस्फेनॉल-ए यानी BPA की मात्रा पर गया। बांझपन से पीड़ित महिलाओं में BPA की अधिकतम मात्रा 5.24 प्रति लीटर तक दर्ज की गई, जबकि अन्य महिलाओं में यह करीब 1.5 प्रति लीटर तक मिली। यानी बांझपन से जूझ रहीं महिलाओं में इस रसायन का स्तर बाकी महिलाओं की तुलना में काफी अधिक पाया गया। शोधकर्ताओं ने इसे महिलाओं की प्रजनन क्षमता से जुड़े बदलावों के साथ जोड़कर देखा है। शोध के दौरान महिलाओं से उनकी रोजमर्रा की आदतों और घर में इस्तेमाल होने वाली चीजों के बारे में भी जानकारी ली गई। इसमें सामने आया कि जिन महिलाओं में BPA की मात्रा ज्यादा थी, उनके घरों में प्लास्टिक के सामान का इस्तेमाल भी अधिक किया जाता था।

रोजाना शरीर में पहुंच रहा प्लास्टिक?

शोध के मुताबिक महिलाओं के शरीर में औसतन सप्ताहभर में 5 से 7 ग्राम तक प्लास्टिक पहुंचने का अनुमान सामने आया। शोधकर्ताओं ने इसकी तुलना मोबाइल फोन की सिम के वजन से करते हुए बताया कि रोजाना करीब दो सिम के बराबर प्लास्टिक शरीर में पहुंच रहा था। यह आंकड़ा प्लास्टिक के रोजमर्रा के इस्तेमाल को लेकर चिंता बढ़ाने वाला है। खासकर तब, जब घर की रसोई से लेकर पानी रखने और खाना पैक करने तक कई जगह प्लास्टिक का इस्तेमाल आम हो चुका है।

प्लास्टिक में पाया जाता है BPA रसायन

स्त्री रोग विभाग की डॉ. रुचिका गर्ग के मुताबिक बिस्फेनॉल-ए का इस्तेमाल पॉलीकार्बोनेट प्लास्टिक और एपॉक्सी रेजिन बनाने में किया जाता है। शोध में यह आशंका सामने आई कि इस रसायन का अधिक संपर्क महिलाओं की प्रजनन क्षमता को प्रभावित कर सकता है। डॉक्टर के मुताबिक शोध में बांझपन से पीड़ित महिलाओं की गर्भधारण से जुड़ी कई दूसरी जांचें सामान्य मिलीं। इसके बावजूद उनके शरीर में BPA की मात्रा अधिक पाई गई। इसी वजह से शोधकर्ताओं ने BPA के संभावित प्रभाव को गंभीरता से देखा।

हार्मोन में भी दिखा बदलाव

शोधार्थी डॉ. प्रतिमा सिंह के मुताबिक बांझपन से जूझ रहीं महिलाओं के हार्मोन में भी बदलाव देखने को मिला। इनमें पुरुष हार्मोन की दर बढ़ी हुई पाई गई। इसके अलावा अंडाणुओं की सक्रियता और गुणवत्ता भी प्रभावित मिली। शोधकर्ताओं के अनुसार इन बदलावों का असर गर्भधारण की क्षमता पर पड़ सकता है। हालांकि, महिलाओं में बांझपन के पीछे कई अलग-अलग कारण हो सकते हैं, इसलिए केवल प्लास्टिक या BPA को इसका जिम्मेदार मानना सही नहीं होगा।

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प्लास्टिक का इस्तेमाल कम करने से मिली मदद

शोध के दौरान कुछ महिलाओं में प्लास्टिक का इस्तेमाल कम करने और चिकित्सकीय उपचार के बाद गर्भधारण में सफलता भी मिली। शोधकर्ताओं ने इसे उत्साहजनक संकेत माना है। इसका मतलब यह नहीं है कि प्लास्टिक छोड़ने मात्र से बांझपन का इलाज संभव है। लेकिन शोध के निष्कर्ष यह जरूर संकेत देते हैं कि प्रजनन स्वास्थ्य को लेकर प्लास्टिक के संपर्क को कम करना एक सावधानी भरा कदम हो सकता है।

रसोई की इन चीजों पर दें ध्यान

रोजमर्रा की जिंदगी में प्लास्टिक से पूरी तरह दूरी बनाना आसान नहीं है, लेकिन इसका इस्तेमाल कम किया जा सकता है। खासकर गर्म खाना या गर्म पानी प्लास्टिक के बर्तनों में रखने से बचना, बार-बार इस्तेमाल होने वाली प्लास्टिक बोतलों की जगह सुरक्षित विकल्प चुनना और भोजन को लंबे समय तक प्लास्टिक में रखने से बचना बेहतर माना जाता है।

Location :  Agra

Published :  9 August 2026, 12:56 PM IST