कभी नाम से कांपता था पूर्वांचल… अब पूरा कुनबा सलाखों के पीछे! आखिर कैसे बिखर गया विजय मिश्रा का साम्राज्य

पूर्वांचल की राजनीति में लंबे समय तक दबदबा रखने वाला एक बड़ा नाम अब कानूनी शिकंजे में पूरी तरह घिरता नजर आ रहा है। अदालत के फैसले के बाद कई पुराने मामलों और राजनीतिक सफर की फिर चर्चा शुरू हो गई है। आखिर कैसे एक ताकतवर परिवार पर लगातार कार्रवाई हुई और अब पूरा कुनबा संकट में क्यों है?

Post Published By: Nidhi Kushwaha
Updated : 16 May 2026, 1:50 PM IST
google-preferred

Varanasi: पूर्वांचल की राजनीति में एक समय ऐसा था जब भदोही की ज्ञानपुर सीट पर विजय मिश्रा (Vijay Mishra) का नाम ही चुनावी जीत की गारंटी माना जाता था। नेताओं से लेकर अफसरों तक हर जगह उनका प्रभाव दिखाई देता था। लेकिन अब वही विजय मिश्रा अदालतों के फैसलों, जेल और सरकारी कार्रवाई के कारण चर्चा में है।

शुक्रवार को MP-MLA Court Prayagraj ने रिश्तेदार की पैतृक संपत्ति पर कब्जा करने और माइनिंग फर्म को अपने नियंत्रण में लेने के मामले में विजय मिश्रा, उसकी पत्नी रामलली मिश्रा और बेटे विष्णु मिश्रा को 10-10 साल की सजा सुनाई। बहू रूपा मिश्रा को चार साल की सजा मिली।

यह फैसला सिर्फ एक केस का नतीजा नहीं माना जा रहा, बल्कि उस राजनीतिक साम्राज्य के पतन की कहानी बन गया है जिसने तीन दशक तक पूर्वांचल में अपना दबदबा कायम रखा।

भदोही में ऐसे शुरू हुआ ‘साम्राज्य’

प्रयागराज के खपटिहां गांव से निकलकर विजय मिश्रा 1980 के दशक में भदोही पहुंचे थे। शुरुआत छोटे कारोबार से हुई, फिर ट्रांसपोर्ट और पेट्रोल पंप का काम शुरू किया। धीरे-धीरे पैसा, पहचान और राजनीतिक संपर्क बढ़ते गए। कांग्रेस के दिग्गज नेता कमलापति त्रिपाठी ने उन्हें राजनीति में आगे बढ़ाया। 1990 में वह ब्लॉक प्रमुख बने और यहीं से पूर्वांचल की राजनीति में उनका प्रभाव तेजी से बढ़ने लगा।

Bareilly: इलाज की उम्मीद लेकर गया था परिवार, मिला सिर्फ दर्द और बेबसी का ठेला!

इसके बाद विजय मिश्रा ने खुद को इलाके में एक ऐसे नेता के रूप में पेश किया जो हर समस्या का हल निकाल सकता था। गांवों में उनकी पकड़ मजबूत होती चली गई और डर व प्रभाव दोनों साथ-साथ बढ़ते गए।

जेल में रहकर भी जीतता रहा चुनाव

ज्ञानपुर सीट से विजय मिश्रा 2002, 2007, 2012 और 2017 में विधायक बने। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि उनकी जीत सिर्फ पार्टी के सहारे नहीं, बल्कि इलाके में उनके मजबूत नेटवर्क और प्रभाव का नतीजा थी। 2012 में जेल में रहने के बावजूद उन्होंने चुनाव जीत लिया। 2017 में समाजवादी पार्टी ने टिकट काट दिया, लेकिन उन्होंने निषाद पार्टी से चुनाव लड़कर जीत दर्ज कर दी। उस समय पूरे देश में मोदी लहर थी, फिर भी विजय मिश्रा अपनी सीट बचाने में सफल रहे।

यही वजह थी कि उन्हें पूर्वांचल की राजनीति का सबसे प्रभावशाली बाहुबली नेताओं में गिना जाने लगा।

फिर बदला दौर… एक केस ने खोल दी मुश्किलों की फाइल

वर्ष 2020 के बाद हालात तेजी से बदलने लगे। रिश्तेदार कृष्णमोहन तिवारी ने आरोप लगाया कि विजय मिश्रा ने उनके पैतृक घर और माइनिंग कारोबार पर कब्जा कर लिया। एफआईआर दर्ज होते ही पुलिस और प्रशासन सक्रिय हुआ। जांच आगे बढ़ी तो कई पुराने मामलों की फाइलें भी खुलने लगीं। धीरे-धीरे विजय मिश्रा, उनके बेटे, पत्नी और परिवार के अन्य सदस्यों पर कार्रवाई तेज हो गई। आज स्थिति यह है कि विजय मिश्रा पर हत्या, रंगदारी, कब्जा और धमकी समेत 83 से ज्यादा मुकदमे दर्ज हैं।

आजम खान की मुश्किलें बढ़ी, इस मामले में MP-MLA कोर्ट से दोषी करार; जानें क्या मिली सजा?

200 करोड़ की संपत्तियां जब्त

सरकारी कार्रवाई सिर्फ मुकदमों तक सीमित नहीं रही। प्रयागराज, लखनऊ, दिल्ली और मध्य प्रदेश तक फैली करीब 200 करोड़ रुपये से ज्यादा की संपत्तियों पर बुलडोजर चला या उन्हें जब्त किया गया। इनमें आलीशान मकान, जमीनें, कारोबारी ठिकाने और परिवार के नाम दर्ज कई संपत्तियां शामिल थीं। कभी जिन संपत्तियों को ताकत की निशानी माना जाता था, अब वही सरकारी कार्रवाई का केंद्र बन गईं।

अब पूरा परिवार जेल में

विजय मिश्रा फिलहाल आगरा जेल में बंद हैं। बेटा विष्णु मिश्रा लखीमपुर खीरी जेल में है। पत्नी रामलली और बहू रूपा मिश्रा को अदालत से सीधे जेल भेजा गया। कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि दोषियों ने समाज के खिलाफ गंभीर अपराध किया है और उनके आपराधिक इतिहास को देखते हुए किसी राहत का आधार नहीं बनता।

Location :  Varanasi

Published :  16 May 2026, 1:50 PM IST

Advertisement