रायबरेली में अनोखी है ये 600 साल पुरानी होली की परंपरा, पढ़ें रोचक कहानी

रायबरेली की गंगा नदी किनारे बना डलमऊ का किला उस दौर की याद दिलाता है, जब यह नगर अवध की सीमाओं की रक्षा करता था। माना जाता है कि यह किला राजा डाल और रावमऊ के नाम से बसा जोकि मुगलों से लेकर अवध के नवाबों तक कई बार सत्ता परिवर्तन का गवाह बना।

Post Published By: Poonam Rajput
Updated : 2 March 2026, 5:49 PM IST

Raebareli: रायबरेली की गंगा नदी किनारे बना डलमऊ का किला उस दौर की याद दिलाता है, जब यह नगर अवध की सीमाओं की रक्षा करता था। माना जाता है कि यह किला राजा डाल और रावमऊ के नाम से बसा जोकि मुगलों से लेकर अवध के नवाबों तक कई बार सत्ता परिवर्तन का गवाह बना। आज यह आधा इतिहास, आधा खण्डहर है। लेकिन गंगा की धारा के साथ इसकी स्मृतियां अब भी जीवित हैं।

पुराने नगर में पहुंचने के लिये है सड़क व रेलमार्ग

डलमऊ नगर की बात करें तो यह बगल में फतेहपुर, प्रतापगढ़, अमेठी, उन्नाव व लखनऊ जनपदों से सीधा जुड़ा है। यहाँ सड़क मार्ग व रेल मार्ग के जरिये आसानी से पहुंचा जा सकता है। वहीं रायबरेली जनपद में डलमऊ तक पहुंचने के लिये यहाँ सीधा रेलमार्ग और सड़क मार्ग से पहुंचा जा सकता है। ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक महत्व को समाहित करते हुए डलमऊ एक प्राचीन नगर है । गंगा किनारे स्थित डलमऊ न केवल एक प्राचीन नगरी है बल्कि मुगल, अवध व अंग्रेजों के काल में भी इसका विशेष महत्व रहा है। दालम्य ऋषि से लेकर राजा डल, इब्राहिम शाह सरकी, मौलाना दाऊद सहित अनेक सूफी संतों और कवि निराला आदि ने यहां के इतिहास को गढ़ा है।

ऋषि दालम्य की भूमि है डलमऊ

इतिहास के असिस्टेंट प्रोफेसर (इतिहास ) व रिसर्चर डॉ जितेंद्र प्रताप सिंह बताते हैं कि डलमऊ की पहचान एवं नामकरण ऋषि दालम्य से मानी जाती है यह इनकी तपस्थली होने से इसका नाम दालम्य बाद में डलमऊ हुआ जिसका विस्तृत विवरण छान्दोग्य उपनिषद में प्राप्त हुआ है।

भारशिवों के वंश राजा डालदेव ने किया किले का निर्माण

उन्होंने बताया कि 15वीं शताब्दी में यहां भारशिवों नागवंश ने अवध क्षेत्र में अपनी मजबूत सत्ता स्थापित की। प्राचीन काल से भर राजवंश का विशेष महत्व रहा है। भरों का उल्लेख ऋग्वेद में भी मिलता है। भर शासक राजा डालदेव ने वैस राजपूतों के साथ मिलकर अवध व उसके आसपास के क्षेत्र में सत्ता स्थापित की। उन्होंने बताया कि राजा डल चार भाई थे डाल देव, बाल देव, ककोरन और भारव। राजा डाल देव ने अपने साम्राज्य का विभाजन अपने अन्य भाइयों के साथ किया था। इनका साम्राज्य मध्य पूर्व में अरखा से लेकर पश्चिम में खीरों तक था। राजा डालदेव का शासन काल 1402-1421 ई. तक माना जाता है। इस दौरान उन्होंने अपने साम्राज्य को काफी मजबूत किया और इस वक्त इस किले का निर्माण किया।

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यह किला लगभग 8 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ था। इसकी ऊंचाई 20 मीटर थी। इसके चारों ओर खाई बनी हुई थी। उसे खाई में गंगा नदी का पानी भरा गया था। जिसकी दीवारें काफी मोटी थी। जिसे भेद पाना बेहद मुश्किल था। किले के अंदर एक बावली थी, जो लगभग 12 मीटर व्यास की थी। उसमें सैन्य अधिकारी व सैनिक भी रहा करते थे।

होली के दिन निहत्थे सैनिकों पर हुआ था मुगलों का हमला

उन्होंने बताया कि उस समय सल्तनत वंश का शासन चल रहा था। मोहम्मद तुगलक का शासन हुआ करता था। उस समय जौनपुर रियासत एक स्वतंत्र राज्य बना जिसका शासक इब्राहिम शाह शर्की था। शर्की ने अपना साम्राज्य पूर्ण अवध क्षेत्र में करना प्रारंभ किया। इस वक्त उसे यह जानकारी हुई की हरदोई क्षेत्र में भरों का बहुत प्रभाव है। उसकी सेना से सबसे पहले हरदोई पर आक्रमण किया। वहां के राजा हरदेव थे। उनके सैनिक उस समय भाग आये और यहाँ डलमऊ में आकर इकट्ठा हो गए। इब्राहिम शर्की का एक प्रतिनिधि यहाँ रहा करता था जिसका नाम हाजी था। उसने बताया कि राजा डाल देव अपना प्रभाव बढ़ा रहे हैं। अतः इनको हराना अति आवश्यक है। इसके बाद इब्राहिम शाह शर्की ने अपनी सेना के साथ डलमऊ की तरफ कूच किया। लेकिन उसे मालूम चला कि राजा डाल की सेना काफी मजबूत है और वह इनसे सीधा मुकाबला नही कर सकते। उनके गुप्तचर ने बताया था कि होली के दिन राजा डाल व उनकी सेना हथियार नही उठाती। जिसके बाद उसने होली के दिन धोखे से यहाँ आक्रमण किया। क्योंकि राजा डाल देव परंपरा से मजबूर थे। डलमऊ से 4 किलोमीटर दूर पखरौली में भीषण युद्ध हुआ। वे और उनकी सेना ने इब्राहिम शाह का मुकाबला निहत्थे किया। जिसमें राजा डाल देव के साथ साथ उनके भाई भी शहादत को प्राप्त हुए। राजा डाल देव लोक नायक मानते थे। इसके बाद यहां की प्रजा को काफी दुख हुआ और उन्होंने होली के दिन होली न मनाने का प्रण लिया। यहाँ आज भी होली के एक सप्ताह बाद होली मनाने की परंपरा है।

हाजी के बेटी को बनाया था राजा डालदेव ने बंधक

प्रो. जितेंद्र प्रताप सिंह अवध गजेटियर का जिक्र करते हुए बताते हैं कि एक बार राजा डालदेव जंगल मे शिकार करने गए थे। उसी जंगल मे जौनपुर के शासक इब्राहिम शर्की के प्रतिनिधि हाजी के बेटी सलमा की पालकी जा रही थी। वह भटक कर डलमऊ किले की तरफ आ गई। उसका सामना राजा डालदेव से हो गया। उसे देख कर डालदेव को मुस्लिम अत्याचार याद आ गया। जो मुस्लिमों ने हिन्दू स्त्रियों पर किये थे। राजा ने सलमा को बंधक बनाने का आदेश दे दिया। जिसके बाद सैय्यद हाजी मदद के लिये इब्राहिम शर्की के पास गया और उसे बहाना मिल गया कि वह डलमऊ पर आक्रमण करें। शर्की राजा डालदेव के जन बल और उसकी वीरता से परिचित था। उसमे सीधे युद्ध करने की हिम्मत नही हुई। उसे यह भी मालूम चला कि डलमऊ हिन्दू जातियों को लेकर एक मजबूत राज्य बन रहा है जोकि उसके लिये बड़ा खतरा बन सकता था। सभी जातियों को लेकर राजा डाल एक मजबूत सेना बना रहे थे जोकि पूरी तरह से युद्ध में प्रशिक्षित सेना थी। ऐसी परिस्थिति में किले पर सीधा धावा बोलना ठीक नही था।

अकबर से लेकर अंग्रेजों तक बनी रही छावनी

उन्होंने यह भी जिक्र किया कि राजा डालदेव की मौत के बाद काफी समय तक स्थिर रहा। मुगल काल में अकबर द्वारा इसको एक परगना के रूप में इस्तेमाल किया यहां एक सैन्य छावनी बनाई गई। वैस राजपूतों के समय में यह सैन्य छावनी बनी रही । जिस पर अवध केसरी राणा बैनी माधव बक्श सिंह का यहाँ प्रभाव रहा। राव माऊ ने उस समय यह पर अपना शासन बनाया। 19वीं सदी में यह एक बड़ा व्यापारिक केंद्र बना। यहाँ पर गंगा नदी में नाव के रास्ते खस का बड़ा व्यापार हुआ करता था। उन्होंने बताया कि ब्रिटिश काल में भी अंग्रेजों की यह महत्वपूर्ण छावनी रही। जिसे युद्ध के समय इस्तेमाल में लाया गया।

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वर्तमान समय में लगातार खंडहर बनता जा रहा है किला

प्रो. जितेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि वर्तमान काल में इस किले की स्थिति बहुत ही खराब है। शासन प्रशासन द्वारा इसकी अपेक्षा की जा रही है। यह पुरानी धरोहर घोषित होनी चाहिए। कुछ समय पहले उनकी संबंधित अधिकारियों से बात हुई । उन्होंने प्रोजेक्ट के बारे में बताया और कहा कि आप इस पर एक शोध करके लिखिए। इसका सौन्दर्यकरण कराया जाएगा और इसे पर्यटन के तौर पर विकसित किया जाएगा ।लेकिन दुर्भाग्य रहा कि उनकी रिसर्च को बीच मे रोक दिया गया। यह ऐतिहासिक किला आज भी खराब अवस्था में है। पर्यटकों का भी यहां पर ज्यादा आना नही रहता। जो भी आता है गंगा स्नान करने यहाँ आता है। जबकि एक जमाने में यह स्थान व्यापारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता था।

किले के जीर्णोद्धार के लिये पर्यटकों ने उठाई मांग

डलमऊ के किले की सैर पर आए एक पर्यटक ने कहा कि वह अक्सर डलमऊ राम किशोर त्रिपाठी ने कहा कि वे परिवार के साथ किले में घूमने आए है। पहले के मुकाबले इस किले की अब हालत खराब है। सीढ़ियां टूट गई हैं और दिवारों की ईंट भी लगातार गिर रही हैं। यहाँ आने जाने का रास्ता बहुत खराब है। रायबरेली से आने वाला मुख्य मार्ग बेहद खराब है जोकि ठीक होना चाहिये। वहीं शिशु पंडित ने कहा कि यहाँ के कर्मचारी व नेता कोई कार्य करवा नही रहे हैं। किले के अंदर सिंचाई विभाग का गेस्ट हाउस है जिसके शौचालय की हालत तक खराब है। बगल में नगर पंचायत अध्यक्ष ने बगल में स्विमिंग पुल बनवा दिया। यहां के अधिकारियों को इस धरोहर को बचा कर रखना चाहिये।

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पर्यटन मंत्रालय को भेजा है प्रपोजल

वहीं नगर पंचायत अध्यक्ष डलमऊ पंडित बृजेश दत्त गौड़ का कहना है कि हमने डलमऊ किले के जीर्णोद्धार के लिये उत्तर प्रदेश के पर्यटन विभाग को प्रपोजल बनाकर 2 महीने पहले दिया है। लेकिन उस पर अभी कोई कार्य नही हुआ है। फिलहाल जो भी बजट हमारे पास है उस से हम काम कराने का प्रयास करते हैं। नगर से आने वाली सड़क को अभी हाल ही में ठीक कराया गया है।

 

Location : 
  • RaeBareli

Published : 
  • 2 March 2026, 5:49 PM IST