तकनीक के दौर में भी कायम है गुरु-शिष्य परंपरा, देवरिया में शिक्षक सम्मान समारोह में छात्रों ने प्रकट की गुरुओं के प्रति कृतज्ञता

माता-पिता के बाद शिक्षक ही वह व्यक्ति होता है, जो विद्यार्थी के भविष्य को सही दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। शिक्षक केवल किताबों का ज्ञान नहीं देते, बल्कि अनुशासन, संस्कार और जीवन की चुनौतियों से लड़ने की सीख भी देते हैं।

Post Published By: Komal Chauhan
Updated : 5 September 2026, 5:05 PM IST
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Deoria: शिक्षक दिवस के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में विद्यालय के छात्र-छात्राओं ने अपने शिक्षकों के प्रति सम्मान और आभार व्यक्त किया। विद्यार्थियों ने शिक्षकों के योगदान पर अपने विचार रखे और उनके मार्गदर्शन को जीवन के लिए महत्वपूर्ण बताया। कार्यक्रम में विद्यालय के प्रबंधक इंजीनियर एफ. अंसारी, प्रधानाचार्य मीना सिंह, संचालक संजय तिवारी, शैलेंद्र पांडे और अमीर आलम सहित विद्यालय के शिक्षक और छात्र-छात्राएं मौजूद रहे।

सेवानिवृत्त कर्मचारियों को भी सम्मान

समारोह में विद्यालय परिवार की ओर से सेवानिवृत्त हुए चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी चंद्रभान यादव और सहायक अध्यापक प्रीति श्रीवास्तव को स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया गया। विद्यालय परिवार ने उनके सेवाकाल में दिए गए योगदान को याद किया और उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की। इस दौरान शिक्षकों ने भी विद्यार्थियों को मेहनत, अनुशासन और अच्छे संस्कारों के साथ आगे बढ़ने का संदेश दिया।

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डॉ. राधाकृष्णन की जयंती से जुड़ा है शिक्षक दिवस

भारत में 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाने की परंपरा देश के दूसरे राष्ट्रपति और महान शिक्षाविद डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन से जुड़ी है। उनका जन्म 5 सितंबर 1888 को तमिलनाडु के तिरुत्तनी में हुआ था।

डॉ. राधाकृष्णन महान दार्शनिक, शिक्षक और लेखक थे। शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान को हमेशा याद किया जाता है। जब वे राष्ट्रपति बने तो उनके विद्यार्थियों और प्रशंसकों ने उनका जन्मदिन मनाने की इच्छा जताई थी। इस पर उन्होंने अपने जन्मदिन को शिक्षकों के सम्मान के लिए समर्पित करने की इच्छा व्यक्त की। इसके बाद 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाने की परंपरा शुरू हुई।

शिक्षा को जीवन निर्माण का माध्यम माना

डॉ. राधाकृष्णन का मानना था कि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार हासिल करना नहीं है। शिक्षा व्यक्ति के चरित्र और व्यक्तित्व का निर्माण भी करती है। उन्होंने देश और विदेश के कई प्रतिष्ठित संस्थानों में अध्यापन किया और भारतीय दर्शन को दुनिया तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे स्वतंत्र भारत के पहले उपराष्ट्रपति और बाद में देश के दूसरे राष्ट्रपति बने। शिक्षा और दर्शन के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें 1954 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

तकनीक के दौर में भी शिक्षक जरूरी

आज इंटरनेट और मोबाइल के जरिए विद्यार्थियों को कुछ ही सेकंड में जानकारी मिल जाती है। लेकिन सही जानकारी को समझना और उसका सही इस्तेमाल करना शिक्षक ही सिखाता है। एक अच्छा शिक्षक विद्यार्थी की प्रतिभा को पहचानता है, उसकी गलतियों को सुधारता है और उसे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है। यही कारण है कि तकनीक के बढ़ते दौर में भी शिक्षक की भूमिका कम नहीं हुई है, बल्कि और महत्वपूर्ण हो गई है।

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गुरु-शिष्य परंपरा आज भी कायम

भारत में गुरु-शिष्य परंपरा काफी पुरानी है। प्राचीन समय में विद्यार्थी गुरु के आश्रम में रहकर शिक्षा प्राप्त करते थे। गुरु उन्हें विषयों के साथ अनुशासन, संस्कार और जीवन मूल्यों की शिक्षा भी देते थे। समय के साथ शिक्षा का स्वरूप बदला, लेकिन गुरु के प्रति सम्मान की भावना आज भी बनी हुई है। शिक्षक दिवस इसी परंपरा को आगे बढ़ाने का अवसर देता है।

शिक्षक का सम्मान, भविष्य का सम्मान

शिक्षक दिवस केवल एक दिन शिक्षकों को शुभकामनाएं देने का अवसर नहीं है। यह दिन समाज और राष्ट्र के निर्माण में शिक्षकों की भूमिका को याद करने का भी दिन है। एक शिक्षक जिस विद्यार्थी को आज पढ़ाता है, वही आगे चलकर डॉक्टर, इंजीनियर, अधिकारी, वैज्ञानिक, पत्रकार या किसी अन्य क्षेत्र में देश की सेवा कर सकता है। इसलिए शिक्षक का सम्मान वास्तव में आने वाली पीढ़ी और देश के भविष्य का सम्मान है।

Location :  Deoria

Published :  5 September 2026, 5:05 PM IST

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