माघ मेले का विवाद बना महाभारत…संत समाज से लेकर राजनीतिक मंच पर पकड़ा तूल, क्या अविमुक्तेश्वरानंद नहीं है शंकराचार्य?

प्रयागराज पिछले साल इन दिनों आस्था के केंद्र के साथ आकर्षण का केंद्र बना हुआ था..धर्मनगरी में महाकुंभ के चलते श्रद्धालुओं का महासैलाब उमड़ा हुआ था, लेकिन साल 2026 की शुरुआत में माघ मेले के दौरान आस्था का संगम विवाद का केंद्र बना हुआ है। वहीं माघ मेले का ये विवाद पूरे प्रदेश में राजनीति का केंद्र बन गया..कांग्रेस और सपा ने इस विवाद को लेकर प्रदेश सरकार और बीजेपी पर हमले शुरु कर दिया।

Updated : 25 January 2026, 7:24 PM IST

New Delhi: प्रयागराज पिछले साल इन दिनों आस्था के केंद्र के साथ आकर्षण का केंद्र बना हुआ था..धर्मनगरी में महाकुंभ के चलते श्रद्धालुओं का महासैलाब उमड़ा हुआ था, लेकिन साल 2026 की शुरुआत में माघ मेले के दौरान आस्था का संगम विवाद का केंद्र बना हुआ है। दरअसल मकर संक्राति के दौरान जोशीमठ पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने सेवकों के साथ संगम में डुबकी लगाने पहुंचें थे..और वीआईपी रास्ते से संगम की और जा रहे थे..तभी प्रशासन ने उनसे शंकराचार्य होने को लेकर सबूत मांगा..और खास रास्ते से उन्हें प्रवेश नहीं करने दिया.वहीं शकराचार्य ने मामले के बाद प्रशासन पर बदसलूकी के आरोप लगाए..और विरोधस्वरुप अपने कैंप में आकर आमरण अनशन शुरु कर दिया..स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद बीते कई दिनों से धरने पर बैठे हैं...वहीं इस विवाद के बाद पूरे देश में उनके पक्ष और विपक्ष में जमकर राजनीति हो रही है..तो आईए जानते हैं कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के शंकराचार्य होने के दावों में कितनी सच्चाई है...

प्रतापगढ़ में लिया जन्म

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का जन्म साल 1969 में प्रतापगढ़ की पट्टी तहसील के ब्राह्मणपुर गांव में हुआ था..उनका वास्तविक नाम उमाशंकर पांडेथ था..ब्राह्मण परिवार में जन्में उमाशंकर बचपन से ही अध्यात्म में रुचि रखते थे..जिसके चलते ही उन्होंने मात्र 9 साल की उम्र में घर छोड़कर अध्यात्म की राह पकड़ ली थी..और वह करपात्री जी महाराज के संघ में शामिल हो गए थे..वहीं करपात्री जी महाराज के संघ में आने के बाद उनकी मुलाकात जोशीमठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरुपानंद से हुई..अविमुक्तेश्वरानंद उनके विचारों से काफी प्रभावित हुए और उन्होंने फिर स्वरुपानंद महाराज की शरण ले ली..आपको बता दें कि अविमुक्तेश्वरानंद को स्वरुपानंद महाराज की वसीयत के आधार पर ही जोशीमठ का शंकराचार्य घोषित किया था..

बनारस से ली शिक्षा

अविमुक्तेश्वरानंद बचपन से ही पढ़ाई में अच्छी खासी रुचि रखते थे..उन्होंने अध्यात्म में चल जाने के बावजूद अपनी शिक्षा जारी रखी..उनकी शुरुआती शिक्षा प्रतापगढ़ और घर छोड़ने के बाद गुजरात में हुई..जिसके बाद वह उच्च शिक्षा के लिए बनारस आ गए..और संस्कृति की शिक्षा के केंद्र सम्पूर्णानंद विश्वविधालय में दाखिला ले लिया..शंकराचार्य ने अपनी संपूर्ण उच्च शिक्षा यहीं से प्राप्त की.उन्होंने बनारस में रहकर आचार्य और शास्त्री की भी डिग्री भी हासिल की..साथ ही संस्कृत में पीएचडी भी की..

राजनीति में भी सक्रिय रहे

शंकराचार्य उच्च शिक्षा के दौरान राजनीति में भी काफी सक्रिय रहे..उन्होंने पढाई के दौरान सक्रियता के साथ छात्र की संघ राजनीति भी की..और छात्रों के मुद्दे जोर-शोर के साथ उठाए..शैक्षणिक काल के दौरान वह एक ओजस वक्ता थे..जिसके चलते उनके वक्तव्यों से लोग काफी प्रभावित होते थे..अविमुक्तेश्वरानंद ने नब्बे के दशक में हिंदुओं से जुड़े हुए काफी मुद्दे उठाए..उन्होंने साल 1994 में छात्रसंघ का चुनाव भी जीता था..हालांकि अपना कॉलेज खत्म करने के बाद वह वापिस फिर से अध्यातम की दुनिया में ही लौट गए..

सन्यास लेकर दीक्षा ग्रहण की

उमा शंकर ने अपनी पढ़ाई के दौरान ही स्वरुपानंद के संपर्क में आ गए थे..और जिसके चलते वह उनसे नियमित मिलते रहते थे..वहीं उनके आचरण से उमा शंकर के अंदर भी सन्यास की अलख जगने लगी..जिसके चलते वह धीरे धीरे राजनीति से दूर होकर अध्यात्म के सरोवर में डूबते चले गए.. उन्होंने स्वरुपानंद से दंडवत शिक्षा ग्रहण की.. और साल 2003 में उमाशंकर पांडे से अविमुक्तेश्वरानंद बन गए..

कैसे बने शंकराचार्य

साल 2022 में शारदा पीठ और जोशी पीठ के शंकराचार्य स्वरुपानंद महाराज ब्रह्मलीन हो गए..वहीं उनके दुनिया से जाने के बाद उनके निजी सचिव ने एक वसीयत सुनाई..जिसके अनुसार जोशीमठ के लिए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के नाम की घोषणा की गई..जिसके बाद उन्हें जोशीमठ का शंकराचार्य चुन लिया गया..हालांकि घोषणा के बाद कुछ मठों ने इस फैसले का विरोध किया..और वह पूरे मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए ..जिसके बाद उच्चतम न्यायालय ने उनके पट्टाभिषेक पर रोक लगा दी.. हालांकि तब से लेकर आज तक जोशीमठ का संचालन अविमुक्तेश्वरानंद के सरंक्षण में ही हो रहा है..लेकिन उन्हें कानूनी तौर पर शंकराचार्य की मान्यता नहीं मिली है..

कितने मठों का समर्थन है

अविमुक्तेश्वरानंद के शंकराचार्य बनाए जाने को लेकर मठों का अलग-अलग मत है..द्वारका मठ और श्रृगेंरी मठ उनको शंकराचार्य बनाए जाने का समर्थन करते हैं..तो वहीं पुरी मठ और गोवर्धन इसको लेकर विरोध करते हैं..वहीं साल 2022 में पुरी मठ के हस्तक्षेप के चलते ही इनके पट्टाभिषेक पर रोक लगी थी..जिसके चलते ही आज तक अविमुक्तेश्वरानंद आधिकारिक शंकराचार्य नहीं बन पाए हैं..

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माघ मेले में क्या हुआ था विवाद

मकर संक्रांति के अवसर पर अविमुक्तेश्वरानंद पालकी में सवार होकर अपने शिष्यों के साथ स्नान करने जा रहे थे..वहीं इस दौरान प्रशासन की तरफ से उन्हें वीआईपी गेट के रास्ते से जाने से रोक दिया गया..प्रशासन की तरफ से अविमुक्तेश्वारनंद को शंकराचार्य होने के सबूत दिखाने की बात कही.. उनके शिष्यों औऱ पुलिस के बीच झड़प हो गई..अविमुक्तेश्वरानंद इस घटना के बाद नाराज हो गए..और वह बिना स्नान करे ही अपने कैंप में वापिस लौट गए..जिसके बाद उन्होंने अपने टेंट के बाहर ही धरना दे दिया..और वह आमरण अनशन पर बैठ गए...

विवाद के बाद राजनीति

वहीं माघ मेले का ये विवाद पूरे प्रदेश में राजनीति का केंद्र बन गया..कांग्रेस और सपा ने इस विवाद को लेकर प्रदेश सरकार और बीजेपी पर हमले शुरु कर दिया..उन्होंने प्रदेश सरकार और बीजेपी को सनातन विरोधी बताया और जिसके के बाद पूरे प्रदेश में विपक्ष हमलावर हो गया..सपा और कांग्रेस ने इसे सनातन धर्म का अपमान बताया..और विरोधस्वरुप जगह-जगह प्रदर्शन किया..वहीं दूसरी तरफ शंकराचार्य अविमुक्तेश्वारनंद ने सीएम योगी की कड़ी निंदा की..अध्यात्म में लीन होने के बावजूद उन्होंने सीएम योगी की तुलना मुगलों से की..और ये भी कहा कि प्रदेश सीएम हिंदू कहलाने लायक नहीं है..वहीं सीएम योगी ने भी उनके बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए टिप्पणी की..और बिना उनका नाम लिए जोरदार हमला किया।

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सीएम योगी ने कहा कि ऐसे तमाम कालनेमी धर्म की आड़ में सनातन के खिलाफ साजिश रच रहे हैं,उन्होंने आगे कहा कि संतो की कोई संपत्ति नहीं होती..राष्ट्र ही उनके लिए सच्ची धरोहर होती है..वहीं सीएम के बयान पर स्वामी मुक्तेश्वरानंद ने भी बिना देरी लगाए पलटवार कर दिया और तीखे शब्दों का प्रयोग करके सीएम योगी को ही काल नेमी कह दिया। अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा जो साधु का चोला पहनकर सत्ता में बैठा है,और गो हत्या नहीं रुकवा पा रहा है असली कालनेमी वही है..फिलहाल माघ मेले का विवाद जल्दी से थमता हुआ नजर नहीं आ रहा है। संत समाज से लेकर राजनेताओं मामले को लेकर अलग अलग विचार ऱख रहे हैं..वहीं दूसरी तरफ यूपी प्रशासन ने अविमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्य होने को लेकर सबूत मांगे है...और यदि उनकी तरफ से सबूत नहीं दिए जाते है...तो उन पर एक्शन लेने की भी चेतावनी दी है।

Location : 
  • New Delhi

Published : 
  • 25 January 2026, 7:24 PM IST