
इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
Prayagraj: उत्तर प्रदेश के मदरसों की जांच को लेकर एक बड़ा कानूनी मोड़ सामने आया है। Allahabad High Court ने National Human Rights Commission द्वारा दिए गए जांच आदेशों पर कड़ा रुख अपनाते हुए न केवल जांच प्रक्रिया पर रोक लगाई है, बल्कि आयोग की कार्यप्रणाली और अधिकार क्षेत्र पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं। अदालत ने फिलहाल 588 अनुदानित मदरसों की आर्थिक अपराध शाखा यानी EOW से कराई जा रही जांच पर अंतरिम रोक लगा दी है।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने यह सवाल उठाया कि क्या मानवाधिकार आयोग को किसी शैक्षणिक संस्था के वित्तीय या प्रशासनिक मामलों में जांच के आदेश देने का अधिकार है। कोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि आयोग ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर आदेश जारी किया।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि मानवाधिकार आयोग का दायरा सीमित है और वह मुख्य रूप से जीवन, स्वतंत्रता, समानता और गरिमा से जुड़े मामलों की जांच के लिए बनाया गया है। ऐसे में किसी संस्थान की वित्तीय अनियमितताओं की जांच कराने का आदेश देना उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर माना जा सकता है।
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सुनवाई के दौरान डिवीजन बेंच में शामिल जस्टिस अतुल श्रीधरन ने अपने आदेश में तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि जब मुस्लिम समुदाय के लोगों के खिलाफ मॉब लिंचिंग जैसी घटनाएं सामने आती हैं, तब आयोग अक्सर सक्रिय नजर नहीं आता। लेकिन अब आयोग मदरसों की जांच जैसे मामलों में हस्तक्षेप कर रहा है। हालांकि इसी मामले में सुनवाई कर रहे जस्टिस विवेक सरन ने कुछ टिप्पणियों से खुद को अलग किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे आदेश के कुछ हिस्सों, खासकर पैराग्राफ 6 और 7 में की गई टिप्पणियों से सहमत नहीं हैं।
पूरा मामला फरवरी महीने में दिए गए उस आदेश से जुड़ा है, जिसमें राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने शिकायत मिलने के बाद उत्तर प्रदेश के 588 अनुदानित मदरसों की जांच आर्थिक अपराध शाखा से कराने का निर्देश दिया था। इसके बाद राज्य सरकार ने आयोग के निर्देश को लागू करते हुए जांच प्रक्रिया शुरू कर दी थी। जांच का उद्देश्य कथित अनियमितताओं की पड़ताल करना बताया गया था।
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सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि मानवाधिकार आयोग का गठन मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के तहत हुआ है। इसका उद्देश्य मानवाधिकार उल्लंघन से जुड़े मामलों की जांच करना है। अदालत ने माना कि मदरसों की वित्तीय जांच को सीधे मानवाधिकार के दायरे में नहीं रखा जा सकता। कोर्ट का कहना था कि यदि किसी संस्था में अनियमितता की शिकायत है, तो ऐसे मामलों को जनहित याचिका के जरिए सीधे अदालत में लाया जा सकता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी आयोग द्वारा सीधे कार्यपालिका को जांच के आदेश देना न्यायिक प्रक्रिया के संतुलन पर सवाल खड़ा करता है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने फिलहाल जांच पर रोक लगाई है और मानवाधिकार आयोग को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने को कहा है। इस प्रकरण की अगली सुनवाई 11 मई को तय की गई है। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में यह मामला संवैधानिक संस्थाओं की शक्तियों और प्रशासनिक हस्तक्षेप की सीमाओं को लेकर एक अहम कानूनी मिसाल बन सकता है।
Location : Prayagraj
Published : 29 April 2026, 2:54 PM IST