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इलाहाबाद हाईकोर्ट
Prayagraj: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि अगर महिला और पुरुष के बीच लंबे समय तक सहमति से शारीरिक संबंध बने हों और शुरुआत से शादी का इरादा न होने का कोई ठोस सबूत न मिले, तो ऐसे मामले को बलात्कार नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने गोरखपुर के पिपराइच थाने में दर्ज एक एफआईआर और उससे जुड़ी पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।
यह फैसला न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह की अदालत ने संजय उर्फ संजय कश्यप की याचिका पर सुनाया। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों, खासकर अमल भगवान नेहुल बनाम महाराष्ट्र मामले का हवाला दिया। अदालत ने कहा कि हर शादी का वादा “तथ्य का भ्रम” नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रेप का मामला तभी बनता है जब यह साबित हो कि आरोपी ने शुरुआत से ही शादी का झूठा वादा किया था और उसका मकसद सिर्फ शारीरिक संबंध बनाना था। अगर बाद में परिस्थितियों या पारिवारिक मतभेदों के कारण रिश्ता टूटता है, तो इसे धोखा या भ्रम नहीं माना जाएगा।
अदालत ने कहा कि पीड़िता ने खुद अपने पत्रों में स्वीकार किया था कि आरोपी का परिवार उसके साथ अच्छा व्यवहार करता था। दोनों पक्षों के बीच शादी चर्च में हो या मंदिर में, इसी मुद्दे पर विवाद हुआ और रिश्ता टूट गया। कोर्ट ने माना कि इससे यह साबित नहीं होता कि आरोपी का शुरू से शादी करने का इरादा नहीं था।
कोर्ट ने यह भी कहा कि पीड़िता बालिग थी और नौवीं तक पढ़ी-लिखी थी। वह करीब एक साल तक रिश्ते में रही। अदालत के मुताबिक सक्षम उम्र की महिला को शारीरिक संबंधों और उनके परिणामों की समझ होती है। कोर्ट ने कहा कि “शादी” और “शादी का वादा” दोनों अलग बातें हैं।
हाईकोर्ट ने कहा कि पीड़िता ने मजिस्ट्रेट के सामने दिए बयान में आरोपी से शादी करने की इच्छा जताई थी। उसने 26 मार्च 2024 की कथित घटना का पहले कोई जिक्र नहीं किया। वहीं उसके दोस्त कृष्णा का बयान भी रिकॉर्ड में नहीं मिला। अदालत ने माना कि एफआईआर आरोपी पर शादी का दबाव बनाने के उद्देश्य से दर्ज कराई गई प्रतीत होती है।
Location : Prayagraj
Published : 21 May 2026, 1:01 PM IST
Topics : Allahabad High Court Consent Relationship Case High Court Big Decision Marriage Promise Rape Case