
नई दिल्ली: संसद के दोनों सदनों से पारित होने के बाद वक्फ संशोधन बिल को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिल गई है और अब यह एक कानून के रूप में लागू हो चुका है।
डाइनामाइट न्यूज़ संवाददाता की रिपोर्ट के मुताबिक, इस कानून को लेकर अब कानूनी विवाद उठ खड़ा हुआ है। सुप्रीम कोर्ट में इस बिल के खिलाफ चार याचिकाएं दायर की गई हैं। जिसमें कहा गया है कि यह कानून भारतीय संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन करता है और मौलिक अधिकारों का हनन करता है।
सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है?
इस कानूनी चुनौती के बीच सबसे महत्वपूर्ण सवाल उठता है कि क्या राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद भी इस कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है? और अगर हां, तो किन आधारों पर इसे रद्द किया जा सकता है या नहीं किया जा सकता?
सुप्रीम कोर्ट का रिव्यू पावर
1. नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA-NRC): इस कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी, और इसकी संवैधानिक वैधता पर बहस हुई थी।
2. आर्टिकल 370 का निरस्तीकरण: जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को समाप्त करने के फैसले को भी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी।
3. प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट: इस एक्ट को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट में मामले लंबित हैं।
क्या सुप्रीम कोर्ट वक्फ संशोधन बिल को रद्द कर सकता है?
बता दें कि यह कानून संविधान के खिलाफ है या यह किसी विशेष व्यक्ति या समुदाय के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है, तो सुप्रीम कोर्ट इसे रद्द कर सकता है।" यदि यह कानून धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का हनन करता है या किसी समुदाय के अधिकारों को छीनता है तो इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाएगी। सुप्रीम कोर्ट तब यह जांचेगा कि क्या यह कानून संविधान के किसी महत्वपूर्ण प्रावधान का उल्लंघन कर रहा है।
जानिए, सुप्रीम कोर्ट कैसे किसी कानून को रद्द करता हैं
सुप्रीम कोर्ट के पास भारतीय संविधान के तहत "संवैधानिक समीक्षा" (Judicial Review) का अधिकार है, जो उसे किसी भी कानून की संवैधानिक वैधता की जांच करने की शक्ति देता है। यह प्रक्रिया सुनिश्चित करती है कि सभी कानून संविधान के मूल ढांचे और मौलिक अधिकारों के अनुरूप हों। यदि कोई कानून इन सिद्धांतों का उल्लंघन करता है, तो सुप्रीम कोर्ट उसे असंवैधानिक (Unconstitutional) घोषित कर सकता है और रद्द कर सकता है।
कैसे दायर का जाती है याचिका?
इस प्रक्रिया की शुरुआत तब होती है जब कोई नागरिक, संगठन या हितधारक सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करता है। यह याचिका आमतौर पर अनुच्छेद 32 के तहत दायर की जाती है, जब मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का मामला होता है। याचिका दायर होने के बाद सुप्रीम कोर्ट इसकी प्रारंभिक जांच करता है और तय करता है कि यह संवैधानिक समीक्षा के लिए योग्य है या नहीं। यदि याचिका स्वीकृत होती है तो इसे एक विशेष बेंच को सौंपा जाता है, जो संविधान के मामलों की सुनवाई करती है।
कानून को कब लागू करने से रोकना पड़ता है?
सुनवाई के दौरान दोनों पक्ष याचिकाकर्ता और सरकार अपने तर्क और सबूत प्रस्तुत करते हैं। सुप्रीम कोर्ट यह जांचता है कि क्या संबंधित कानून संविधान के मूल ढांचे, मौलिक अधिकारों और अन्य महत्वपूर्ण प्रावधानों का उल्लंघन कर रहा है। अदालत यह भी देखती है कि क्या कानून धार्मिक स्वतंत्रता, समानता के अधिकार या किसी अन्य संवैधानिक अधिकार का हनन करता है। यदि सुप्रीम कोर्ट पाता है कि कानून संविधान के विरुद्ध है तो वह इसे असंवैधानिक घोषित करता है और रद्द कर देता है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सरकार को उस कानून को लागू करने से रोकना पड़ता है और यह निर्णय पूरे देश पर लागू होता है।
Published : 6 April 2025, 12:58 PM IST
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