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आपको बता दें कि 22 मार्च 2026 को पड़ने वाली वासुदेव विनायक चतुर्थी महज एक साधारण उपवास नहीं, बल्कि भगवान विष्णु और गणेश की संयुक्त कृपा पाने का एक दुर्लभ अवसर है? इस दिन सुबह 11:15 से दोपहर 1:41 के बीच की गई पूजा आखिर क्यों इतनी फलदायी मानी जाती है। पढ़ें पूरी खबर
वासुदेव विनायक चतुर्थी को लेकर भक्तों में उत्साह
New Delhi: चैत्र माह में आने वाली वासुदेव विनायक चतुर्थी का धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व माना जाता है। साल 2026 में यह पावन व्रत 22 मार्च को रखा जाएगा। धार्मिक ग्रंथों में इस व्रत को अत्यंत शुभ और मनोकामनाएं पूर्ण करने वाला बताया गया है। कई स्थानों पर इसे वरद विनायक चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन भगवान गणेश के वासुदेव स्वरूप की पूजा की जाती है और भक्त जीवन के विघ्नों को दूर करने की प्रार्थना करते हैं।
पंचांग के अनुसार चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि 21 मार्च 2026 को रात 11:56 बजे से शुरू होगी और 22 मार्च 2026 को रात 9:16 बजे तक रहेगी। इस दिन गणपति पूजा के लिए मध्याह्न काल को विशेष शुभ माना जाता है।
पूजा के लिए सबसे शुभ मध्याह्न मुहूर्त सुबह 11:15 बजे से शुरू होकर दोपहर 1:41 बजे तक रहेगा। इस विशेष दिन पर सुबह 8:15 बजे से लेकर रात 10:15 बजे तक चंद्र दर्शन वर्जित माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस निर्धारित समय अवधि के दौरान चंद्रमा को देखने से बचना चाहिए।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जो व्यक्ति चतुर्थी के दिन विधि-विधान से व्रत रखकर भगवान गणेश की पूजा करता है, उसे जीवन में आने वाली बाधाओं से मुक्ति मिलती है। इस व्रत को विशेष रूप से विद्यार्थियों, व्यापारियों, गृहस्थों और नया कार्य शुरू करने वाले लोगों के लिए लाभकारी माना गया है।
ऐसा कहा जाता है कि इस दिन भगवान गणेश की आराधना करने से सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है और परिवार में शांति बनी रहती है। साथ ही जीवन की कठिन परिस्थितियों से निकलने की शक्ति भी प्राप्त होती है। कई धार्मिक ग्रंथों में यह भी उल्लेख मिलता है कि इस व्रत से भगवान विष्णु की कृपा भी प्राप्त होती है।
इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर व्रत का संकल्प लेना चाहिए। इसके बाद पूजा स्थल को साफ कर लकड़ी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर भगवान गणेश की मूर्ति स्थापित की जाती है।
पूजन के दौरान गणपति को दूर्वा, मोदक, लड्डू, सिंदूर, शमीपत्र और सुपारी अर्पित की जाती है। इसके बाद विधिपूर्वक षोडशोपचार पूजन किया जाता है। भक्त इस दिन गणपति अथर्वशीर्ष, संकट नाशन गणेश स्तोत्र और अन्य गणेश मंत्रों का पाठ भी करते हैं।
व्रत की पूर्णता के लिए वासुदेव चतुर्थी की कथा सुनना या पढ़ना शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार अगले दिन यानी पंचमी तिथि को ब्राह्मण को भोजन कराकर या विधिपूर्वक व्रत का पारण किया जाता है।