
UP पंचायत चुनाव पर हाईकोर्ट का बड़ा सख्त रुख (Img: AI Generated Image)
Lucknow: उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव को लेकर लंबे समय से चल रही चर्चाओं के बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा है कि संविधान पंचायतों का कार्यकाल पांच साल से अधिक बढ़ाने की अनुमति नहीं देता। ऐसे में चुनाव को अनावश्यक रूप से टालना उचित नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने राज्य सरकार को 13 जुलाई तक पंचायत चुनाव कराने की पूरी रूपरेखा पेश करने का निर्देश दिया है। इस आदेश के बाद अब सरकार पर चुनाव की तैयारियां तेज करने का दबाव बढ़ गया है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने पर भी गंभीर सवाल खड़े किए। कोर्ट ने पूछा कि जिन कानूनी प्रावधानों को पहले ही असंवैधानिक घोषित किया जा चुका है, उनके आधार पर आखिर किस परिस्थिति में ग्राम प्रधानों को पंचायत का कार्यभार सौंपा गया। अदालत ने पंचायत राज विभाग के प्रमुख सचिव से इस पूरे मामले में विस्तृत हलफनामा दाखिल करने को कहा है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल औपचारिक जवाब नहीं चलेगा, बल्कि ठोस और तार्किक कारण बताने होंगे।
सुनवाई के दौरान राज्य चुनाव आयोग की ओर से अदालत को बताया गया कि चुनाव कराने की तैयारी पूरी कर ली गई है। आयोग ने यह भी जानकारी दी कि 10 जून 2026 को मतदाता सूची प्रकाशित की जा चुकी है। आयोग का कहना है कि उसकी ओर से सभी आवश्यक प्रक्रियाएं पूरी हैं, लेकिन राज्य सरकार की तरफ से जरूरी प्रशासनिक व्यवस्थाएं उपलब्ध नहीं कराई गई हैं। इसी वजह से चुनाव प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।
यह मामला सहारनपुर निवासी अरविंद राठौर द्वारा दाखिल याचिका के बाद अदालत पहुंचा। याचिका में 25 और 26 मई 2026 को जारी उन शासनादेशों को चुनौती दी गई है, जिनके जरिए ग्राम प्रधानों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी उन्हें पंचायत के संचालन की जिम्मेदारी दी गई। याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि संविधान के अनुसार पंचायतों का चुनाव समय पर होना जरूरी है और छह महीने से अधिक समय तक चुनाव नहीं टाला जा सकता। साथ ही यह भी कहा गया कि प्रधानों को प्रशासक बनाने का प्रावधान पहले ही अदालत द्वारा असंवैधानिक घोषित किया जा चुका है।
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पंचायत राज विभाग के प्रमुख सचिव को सख्त चेतावनी भी दी। अदालत ने कहा कि यदि हलफनामे में कार्यकाल बढ़ाने के पीछे कोई ठोस और कानूनी कारण नहीं बताया गया, तो संबंधित अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होना पड़ सकता है। इतना ही नहीं, अदालत ने यह भी संकेत दिया कि संतोषजनक जवाब नहीं मिलने पर अवमानना की कार्रवाई पर भी विचार किया जा सकता है।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में संविधान के अनुच्छेद 243-ई और 243-के का उल्लेख करते हुए कहा कि पंचायतों का कार्यकाल पांच वर्ष से अधिक नहीं बढ़ाया जा सकता। लोकतांत्रिक व्यवस्था में समय पर चुनाव कराना सरकार और चुनाव आयोग दोनों की संवैधानिक जिम्मेदारी है। कोर्ट ने यह भी याद दिलाया कि पहले के एक मामले में खंडपीठ 25 और 26 मई 2026 के उन्हीं आदेशों को असंवैधानिक घोषित कर चुकी है, जिनके आधार पर ग्राम प्रधानों को कार्यभार सौंपा गया था।
Location : Lucknow
Published : 27 June 2026, 10:35 AM IST