दिवाली की रौनक तो है, लेकिन कहां खो गए मिट्टी के घरौंदे और कंदील? बदलते समय के साथ छूट रही हैं ये परंपराएं
दिवाली की तैयारियां अब पहले जैसी नहीं रहीं। कभी बच्चे मिट्टी के घरौंदे बनाते थे, घरों में कंदील तैयार होते थे और मिठाइयां पड़ोसियों में बांटी जाती थीं। बदलते समय के साथ त्योहार से जुड़ी कई पुरानी परंपराएं भी पीछे छूट रही हैं।
दिवाली आते ही घरों में रोशनी, बाजारों में सजावट और मिठाइयों की खुशबू फैल जाती है। पहले इस त्योहार की तैयारियां कई दिन पहले शुरू हो जाती थीं। बच्चे मिट्टी के घरौंदे बनाते थे, घरों में कागज के कंदील तैयार होते थे और महिलाएं अपने हाथों से पकवान बनाकर पड़ोसियों में बांटती थीं। आज त्योहार मनाने का तरीका काफी बदल गया है। बाजार की चमक और ऑनलाइन खरीदारी के बीच कई छोटी-छोटी परंपराएं कुछ इलाकों और परिवारों में कम होती दिखाई दे रही हैं।
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दिवाली पर घरौंदे बनाने की परंपरा खासतौर पर बिहार और पूर्वांचल के कई इलाकों में देखने को मिलती रही है। बच्चे और परिवार के सदस्य मिट्टी से छोटे-छोटे घर बनाते थे। उन्हें रंगों, फूलों, दीयों और दूसरी सजावटी चीजों से सजाया जाता था। घरौंदों के साथ मिट्टी के छोटे बर्तन यानी कुलिया-चुकिया भी रखे जाते थे। यह सिर्फ खेल नहीं, बल्कि बच्चों के लिए त्योहार से जुड़ने का एक रचनात्मक तरीका था। अब तैयार सजावटी सामान और सीमित जगह वाले घरों के कारण कई परिवारों में यह परंपरा पहले जैसी नजर नहीं आती।
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पहले दिवाली से पहले घरों में रंगीन कागज, बांस और धागे की मदद से कंदील बनाए जाते थे। बच्चे बड़ों के साथ मिलकर इन्हें तैयार करते थे और फिर घर के बाहर टांगते थे। अब बाजार में तरह-तरह की तैयार लाइटें और सजावटी कंदील आसानी से मिल जाते हैं। ऐसे में खुद सजावट बनाने की परंपरा कई घरों में कम हो गई है।
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पहले दिवाली की तैयारियों में घर पर मिठाइयां और नमकीन बनाने का भी खास स्थान था। परिवार के लोग मिलकर पकवान तैयार करते और पड़ोसियों के घर मिठाई पहुंचाते थे। इससे त्योहार केवल अपने घर तक सीमित नहीं रहता था, बल्कि आसपास के लोगों के साथ खुशियां बांटने का मौका बनता था। अब बाजार से मिठाई खरीदना और ऑनलाइन गिफ्ट भेजना आसान हो गया है। हालांकि कई परिवार आज भी घर पर पकवान बनाते और बांटते हैं।
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दिवाली की पूजा में खील, बताशे और चीनी से बने खिलौने भी पारंपरिक रूप से शामिल रहे हैं। पुराने समय में चीनी से जानवरों और दूसरी आकृतियों वाले खिलौने बनाए जाते थे। कई परिवारों में इन्हें पूजा के बाद प्रसाद के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। अब बाजार में चॉकलेट, ड्राई फ्रूट्स और महंगे गिफ्ट पैक का चलन बढ़ा है। हालांकि खील-बताशों की परंपरा आज भी कई जगह कायम है।
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गोवर्धन पूजा में पशुओं को सजाने की परंपरा पर असर दिवाली के अगले दिन होने वाली गोवर्धन पूजा में कई ग्रामीण इलाकों में गाय-बैलों को सजाने, तिलक लगाने और उनकी पूजा करने की परंपरा रही है। लेकिन खेती में मशीनों का इस्तेमाल बढ़ने और पशुपालन कम होने से कुछ जगहों पर यह परंपरा प्रभावित हुई है। उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों में भी पशुओं की संख्या घटने के कारण गोवर्धन पूजा से जुड़ी कुछ पुरानी रस्में कम होने की खबर सामने आई है।
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क्या सच में खत्म हो रही हैं ये परंपराएं? ऐसा नहीं है कि ये सभी परंपराएं पूरी तरह खत्म हो चुकी हैं। देश के कई गांवों और शहरों में आज भी लोग घरौंदे बनाते हैं, मिट्टी के दीये जलाते हैं और पारंपरिक तरीके से पूजा करते हैं। लेकिन बदलती जीवनशैली, शहरीकरण, समय की कमी और बाजार में आसानी से मिलने वाले तैयार सामान ने त्योहार मनाने के तरीकों को जरूर बदला है। दिवाली का असली उत्साह सिर्फ महंगी लाइटों और सजावट में नहीं, बल्कि उन छोटी-छोटी खुशियों में भी है, जिन्हें परिवार मिलकर तैयार करता था। अगर नई पीढ़ी को इन परंपराओं से जोड़ा जाए, तो मिट्टी के घरौंदे, हाथों से बने कंदील और घर के पकवान केवल पुरानी यादें बनकर नहीं रहेंगे।
दिवाली आते ही घरों में रोशनी, बाजारों में सजावट और मिठाइयों की खुशबू फैल जाती है। पहले इस त्योहार की तैयारियां कई दिन पहले शुरू हो जाती थीं। बच्चे मिट्टी के घरौंदे बनाते थे, घरों में कागज के कंदील तैयार होते थे और महिलाएं अपने हाथों से पकवान बनाकर पड़ोसियों में बांटती थीं। आज त्योहार मनाने का तरीका काफी बदल गया है। बाजार की चमक और ऑनलाइन खरीदारी के बीच कई छोटी-छोटी परंपराएं कुछ इलाकों और परिवारों में कम होती दिखाई दे रही हैं।
दिवाली पर घरौंदे बनाने की परंपरा खासतौर पर बिहार और पूर्वांचल के कई इलाकों में देखने को मिलती रही है। बच्चे और परिवार के सदस्य मिट्टी से छोटे-छोटे घर बनाते थे। उन्हें रंगों, फूलों, दीयों और दूसरी सजावटी चीजों से सजाया जाता था। घरौंदों के साथ मिट्टी के छोटे बर्तन यानी कुलिया-चुकिया भी रखे जाते थे। यह सिर्फ खेल नहीं, बल्कि बच्चों के लिए त्योहार से जुड़ने का एक रचनात्मक तरीका था। अब तैयार सजावटी सामान और सीमित जगह वाले घरों के कारण कई परिवारों में यह परंपरा पहले जैसी नजर नहीं आती।
पहले दिवाली से पहले घरों में रंगीन कागज, बांस और धागे की मदद से कंदील बनाए जाते थे। बच्चे बड़ों के साथ मिलकर इन्हें तैयार करते थे और फिर घर के बाहर टांगते थे। अब बाजार में तरह-तरह की तैयार लाइटें और सजावटी कंदील आसानी से मिल जाते हैं। ऐसे में खुद सजावट बनाने की परंपरा कई घरों में कम हो गई है।
पहले दिवाली की तैयारियों में घर पर मिठाइयां और नमकीन बनाने का भी खास स्थान था। परिवार के लोग मिलकर पकवान तैयार करते और पड़ोसियों के घर मिठाई पहुंचाते थे। इससे त्योहार केवल अपने घर तक सीमित नहीं रहता था, बल्कि आसपास के लोगों के साथ खुशियां बांटने का मौका बनता था। अब बाजार से मिठाई खरीदना और ऑनलाइन गिफ्ट भेजना आसान हो गया है। हालांकि कई परिवार आज भी घर पर पकवान बनाते और बांटते हैं।
दिवाली की पूजा में खील, बताशे और चीनी से बने खिलौने भी पारंपरिक रूप से शामिल रहे हैं। पुराने समय में चीनी से जानवरों और दूसरी आकृतियों वाले खिलौने बनाए जाते थे। कई परिवारों में इन्हें पूजा के बाद प्रसाद के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। अब बाजार में चॉकलेट, ड्राई फ्रूट्स और महंगे गिफ्ट पैक का चलन बढ़ा है। हालांकि खील-बताशों की परंपरा आज भी कई जगह कायम है।
गोवर्धन पूजा में पशुओं को सजाने की परंपरा पर असर दिवाली के अगले दिन होने वाली गोवर्धन पूजा में कई ग्रामीण इलाकों में गाय-बैलों को सजाने, तिलक लगाने और उनकी पूजा करने की परंपरा रही है। लेकिन खेती में मशीनों का इस्तेमाल बढ़ने और पशुपालन कम होने से कुछ जगहों पर यह परंपरा प्रभावित हुई है। उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों में भी पशुओं की संख्या घटने के कारण गोवर्धन पूजा से जुड़ी कुछ पुरानी रस्में कम होने की खबर सामने आई है।
क्या सच में खत्म हो रही हैं ये परंपराएं? ऐसा नहीं है कि ये सभी परंपराएं पूरी तरह खत्म हो चुकी हैं। देश के कई गांवों और शहरों में आज भी लोग घरौंदे बनाते हैं, मिट्टी के दीये जलाते हैं और पारंपरिक तरीके से पूजा करते हैं। लेकिन बदलती जीवनशैली, शहरीकरण, समय की कमी और बाजार में आसानी से मिलने वाले तैयार सामान ने त्योहार मनाने के तरीकों को जरूर बदला है। दिवाली का असली उत्साह सिर्फ महंगी लाइटों और सजावट में नहीं, बल्कि उन छोटी-छोटी खुशियों में भी है, जिन्हें परिवार मिलकर तैयार करता था। अगर नई पीढ़ी को इन परंपराओं से जोड़ा जाए, तो मिट्टी के घरौंदे, हाथों से बने कंदील और घर के पकवान केवल पुरानी यादें बनकर नहीं रहेंगे।